कानून मंत्री बनते ही देश की न्यायिक व्यवस्था को लेकर चिंताएं जताकर लगता है कि अश्विनी कुमार कानून के मोरचे पर एक अलग लकीर खींचना चाहते हैं। पहले उन्होंने प्रस्तावित न्यायिक जवाबदेही बिल में उच्चतर न्यायपालिका पर टिप्पणी करने से रोक लगाने पर कायम रहने का संकेत दिया, जिसे लेकर विवाद शुरू हो गया है। इस विवाद पर परदा डालने के लिहाज से ही शायद उन्होंने करीब साढ़े तीन करोड़ लंबित मुकदमों को निपटाने के लिए संजीदा नजरिया अपनाने का भरोसा दिलाया है।
पीढ़ियों से मुकदमेबाजी का दंश झेल रहे लोगों के मुकदमों का निपटारा हो जाए और अमेरिका-यूरोप की तरह त्वरित न्याय की अवधारणा को अमलीजामा पहनाया जा सके, तो इससे अच्छी बात भला क्या हो सकती है! अगर ऐसा कर पाने में अश्विनी कुमार सफल हुए, तो निश्चित तौर पर वह एक इबारत लिखने में कामयाब होंगे। लेकिन यह तभी संभव होगा, जब मौजूदा न्यायिक समस्याओं पर न सिर्फ राजनीति से ऊपर उठकर विचार किया जाए, बल्कि उसका हल भी खोजा जाए।
हमारे देश में न्यायिक व्यवस्था को भी हमेशा राजनीति के चश्मे से ही देखा जाता है। चूंकि न्यायिक व्यवस्था भी मानवीय व्यवस्था का ही एक अंग है, लिहाजा वहां भी गड़बड़ियां हो सकती हैं। लेकिन हर जगह राजनीति ढूंढ़ना और उसी के बरक्स हल खोजना समझदारी नहीं है। अगर सरकार कुछ तथ्यों पर गौर करे और इसमें न्यायपालिका का सहयोग ले, तो निश्चित रूप से हालात में सुधार हो सकते हैं और देश को मुकदमों के बोझ से मुक्ति मिल सकती है। हालांकि अश्विनी कुमार पहले व्यक्ति या कानून मंत्री नहीं हैं, जिन्हें लंबित मुकदमों के निपटारे की चिंता परेशान कर रही है। इसे लेकर पूर्व मुख्य न्यायाधीश एचएस कपाड़िया भी अपनी चिंता जता चुके हैं।
दरअसल जिस गति से देश में मुकदमे दायर हो रहे हैं, उनके निपटारे की व्यवस्था उतनी तेज नहीं है। जब तक न्यायालय पुराने मामलों का निपटारा कर भी नहीं पाते कि नए मुकदमे उनके सामने आ जाते हैं। एक तो अपने यहां विकसित देशों की तुलना में जजों की संख्या बेहद कम है। विकसित देशों में दस लाख की जनसंख्या पर कम से कम पचास जज हैं। लेकिन मुकदमेबाजी के लिए मशहूर भारतीय समाज के लिए दस लाख की जनसंख्या पर सिर्फ दस जज ही हैं। उनमें भी तीन हजार जजों की जगहें अकेले निचली अदालतों में ही खाली हैं।
इसी तरह उच्च न्यायालयों में भी मौजूदा स्वीकृत जजों की पूरी संख्या नहीं है। देश के सभी हाई कोर्ट में कुल मिलाकर जजों के तीन सौ पद खाली हैं। इतना ही नहीं, सर्वोच्च न्यायालय में भी जजों के छह पद खाली हैं। सबसे हैरत की बात है कि इन स्वीकृत पदों को भरने की जिम्मेदारी जहां निचले स्तर पर न्यायपालिका की है, तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में रिक्त पदों को भरने की जिम्मेदारी एक हद तक सरकार की भी है। यानी इस समस्या के लिए दोनों ही जिम्मेदार हैं। कई बार दोनों ही पक्षों का अहं इतना भारी पड़ जाता है कि उन्हें आम जनता की परेशानियों का खयाल नहीं आता।
इसके साथ ही बढ़ते मुकदमों और उन्हें लटकाने के पीछे सरकारी विभागों का भी खासा योगदान है। कई बार अधिकारी भी अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए मामूली मामलों पर लोगों को अदालतों में घसीट लाते हैं। दूसरी तरफ पुलिस भी कई बार लोगों को झूठे मुकदमों में फंसाकर अपना गुस्सा निकालती है। आम लोग भी मुकदमेबाजी के जरिये ही अपने दुश्मनों को सबक सिखाने की कोशिश करते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि बढ़ते मुकदमों की संख्या पर अंकुश लगाने के लिए ठोस प्रयास किए जाएं।
यह काम कार्यपालिका के जरिये ही संभव हो सकता है। इसके साथ ही निचली न्यायपालिका को भी औपनिवेशिक मानसिकता से हटकर मामूली मुकदमों का तत्काल निपटारा करना होगा। इसके लिए कानून मंत्रालय को ही खास पहल करनी होगी। यह बात और है कि अश्विनी कुमार के पास काफी कम वक्त है। फिर भी अगर वह इस दिशा में सकारात्मक पहल करते हैं, तो भारतीय समाज की मुकदमेबाज की छवि बदलने की दिशा में यह सार्थक कदम होगा।