दुनिया भर में अत्यधिक तापमान पर नजर रखने वाले जलवायु विज्ञानी मैक्सिमिलियानो हेरेरा के अनुसार, साइबेरिया के जलतुरोवोस्क में विगत तीन जून को तापमान 37.9 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो वहां के इतिहास का सबसे गर्म दिन था। वर्ष 2021 में ब्रिटिश कोलंबिया का एक छोटा-सा गांव लिटन तथा एक और 'ठंडा' देश कनाडा अंतरराष्ट्रीय समाचारों में छा गया, जब वहां 49.6 डिग्री सेल्सियस का उच्च तापमान दर्ज किया गया।
समशीतोष्ण जलवायु से बेहद परिचित क्षेत्र कनाडा की व्यवस्था के लिए ऐसी गर्मी एक झटका थी, जो ऐसी चिलचिलाती गर्मी के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं था। लेकिन वास्तव में जिस चीज ने दुनिया भर के लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया, वह है वायु प्रदूषण के मामले में न्यूयॉर्क का नई दिल्ली से आगे निकल जाना। इसकी कल्पना करना भी असंभव था। लेकिन वास्तव में ऐसा हुआ।
जैसा कि मैंने कहा, कनाडा के जंगल की आग अब भी दुनिया भर के समाचारों में शीर्ष पर है। इसका एक कारण यह है कि यह अब केवल कनाडा की कहानी नहीं है। जंगल की आग का धुआं अमेरिका के कुछ हिस्सों की सीमा को पार कर गया है। नतीजतन, न्यूयॉर्क शहर की हवा की गुणवत्ता में तेजी से गिरावट आई है और यदि संक्षेप में कहें, तो न्यूयॉर्क में प्रदूषण का स्तर नई दिल्ली को पीछे छोड़ रहा है। अमेरिका की वित्तीय राजधानी न्यूयॉर्क के प्रसिद्ध क्षितिज की धुएं के धुंधले पर्दे में छिपी छवियां पूरे सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं। खबर है कि कनाडा के जंगल की आग के चलते खराब गुणवत्ता वाली हवा वहां पर स्कूलों को बंद करने का कारण बनी।
अत्यधिक प्रदूषित हवा के बीच रहने और काम करने के अभ्यस्त विकासशील दुनिया के बहुत से लोग इस विडंबना से नहीं बचे हैं। दिल्ली के अनेक निवासी, जो हमेशा सबसे खराब वायु गुणवत्ता वाले शहर में रहने के लिए अभिशप्त हैं, ट्विटर पर न्यूयॉर्क के अपने दोस्तों के साथ सहानुभूति जताते हैं, जो खराब वायु गुणवत्ता के साथ संघर्ष कर रहे थे और उन्हें याद दिलाते हैं कि ग्लोबल साउथ साल भर ऐसी ही परिस्थिति में रहता है। पिछले दिसंबर में चौबीसों घंटे औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 410 को पार कर गया था और दिल्ली में धुंध की घनी परत छा गई थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि बेहतर एक्यूआई 50 से नीचे होना चाहिए।
बहुत लोग अब पूछ रहे हैं कि क्या कनाडा में जंगल की आग जलवायु परिवर्तन के कारण है। बेशक, जंगल की प्रत्येक आग को स्वतः सीधे जलवायु परिवर्तन से नहीं जोड़ा जा सकता है। विज्ञान जटिल है। इसमें हम भूमि का प्रबंधन कैसे करते हैं जैसे मानवीय कारक और जंगल भी योगदान करते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन गर्मी और सूखे जैसी स्थिति बना रहा है, जिससे जंगल में आग लगने की आशंका बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों ने संकेत दिया है कि मौजूदा जंगल की आग में जलवायु संकेत वास्तव में मजबूत है और एक बड़ा क्षेत्र जल गया है, और बहुत गंभीर आग लगी है।
यह सब यह भी दर्शाता है कि कई मामलों में ग्लोबल साउथ यानी विकासशील दुनिया और ग्लोबल नॉर्थ यानी विकसित दुनिया के बीच का फर्क खत्म हो रहा है। प्रदूषित हवा को 'तीसरी दुनिया' में जीवन के हिस्से के तौर पर देखा जाता था और माना जाता था कि विकसित दुनिया ऐसी चीजों से आगे निकल चुकी है। लेकिन जलवायु परिवर्तन यह बता रहा है कि दुनिया को ऐसे विचारों पर फिर से सोचने की जरूरत है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज तक दुनिया के बेहद धनी देश असमान रूप से ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार रहे हैं, और हम जो देख रहे हैं, वह उसी का परिणाम है। विकसित देशों में दुनिया की 20 फीसदी आबादी रहती है। औद्योगिक युग की शुरुआत के बाद से वे पृथ्वी के वायुमंडल में 80 प्रतिशत कार्बन डाई ऑक्साइड उगलने के लिए जिम्मेदार हैं। यह अतिरिक्त कार्बन डाई ऑक्साइड ही जलवायु परिवर्तन का कारण बन रही है।
संयुक्त राष्ट्र की बैठकों में विकासशील देशों ने मांग की है कि बढ़ते तापमान से होने वाले नुकसान के लिए उन्हें मुआवजा दिया जाना चाहिए। विकसित देशों ने सैद्धांतिक रूप से इसे स्वीकार कर लिया है, पर अभी तक अपने द्वारा निर्धारित वित्तपोषण के लक्ष्यों को पूरा नहीं किया है। वास्तव में, वे इस लक्ष्य से बहुत पीछे हैं और विकासशील देशों को अपने राष्ट्रीय बजट से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटना पड़ रहा है।
समशीतोष्ण देशों में अत्यधिक गर्मी और विकसित दुनिया में प्रदूषित हवा हाल की घटनाएं हो सकती हैं। लेकिन कुल मिलाकर, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव दुनिया भर में एक समान नहीं है। ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों के लोग अब भी असमान रूप से इसके परिणामों से प्रभावित हैं, जिसके लिए ग्लोबल नॉर्थ यानी विकसित देशों को काफी हद तक जिम्मेदार माना जाता है। चरम मौसम की घटनाओं और बदलती जलवायु के प्रभाव भी हर देश में समान रूप से अनुभव नहीं किए जाते हैं; ऐसे कई समुदाय हैं, जो समाज और व्यवस्था में गहरी जड़ें जमाए असमानताओं के कारण दूसरों की तुलना में अधिक नुकसान उठाते हैं।
हाल की घटनाओं का सबक यही है कि जलवायु परिवर्तन अब एक सामूहिक समस्या है और इसे रोकने के लिए सामूहिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से अब कोई भी प्रतिरक्षित नहीं है।