कनाडा की छवि काफी नीरस रही है। इतनी कि 1980 के दशक में द न्यू रिपब्लिक नामक पत्रिका ने अपनी सबसे उबाऊ शीर्षक प्रतियोगिता में 'वर्थवाइल कैनेडियन इनिशिएटिव' (कनाडा की लाभकारी पहल) को दुनिया का सबसे उबाऊ शीर्षक करार दिया था। मगर जब बात आर्थिक नीति की हो, तब इसकी ऐसी छवि कोई मायने नहीं रखती। हैरत की बात है कि इस मामले में कनाडा अमूमन दूसरे देशों की तुलना में ज्यादा भविष्यदर्शी रहा है। और ठीक यही बात फिर साबित हो रही है।
कनाडा के मतदाताओं ने सत्ताधारी कंजरवेटिव पार्टी को सबक सिखाते हुए वामपंथी रुझान की मध्यमार्गी लिबरल पार्टी पर भरोसा जताया है। लिबरल पार्टी से जुड़ी तमाम दिलचस्प बातों के अलावा जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया है, वह है, घाटा आधारित मितव्ययिता की पुरानी नीति, जिससे बेशक पश्चिम का पूरा राजनीतिक विमर्श प्रभावित है, मगर लिबरल पार्टी ने इसे पूरी तरह से खारिज किया। लिबरल पार्टी ने कीन्स का नजरिया अपनाया, जिसके एवज में उसे भारी जीत मिली। इससे पहले कि मैं इन नतीजों के निहितार्थ पर गौर करूं, चलिए, गौर करते हैं, खासकर मुद्रा नीति के मामले में लीक से अलग हटकर चलने के कनाडा के लंबे इतिहास पर।
1950 के दशक में हर देश किसी भी कीमत पर अपनी मुद्रा को अमेरिकी डॉलर की छाया में देखना चाहता था। मगर इन सबसे अलग कनाडा ने अपने डॉलर के मूल्य को ऊपर-नीचे होने दिया और पाया कि यह बदलती विनिमय दर दरअसल उसके लिए फायदेमंद थी। कालांतर में जब यूरोपीय देश यूरो समूह का हिस्सा बनने के लिए उठा-पटक कर रहे थे और साझा मुद्रा का हिस्सा न बनने वाले देश को गंभीर नतीजे भुगतने की बात की जा रही थी, तब कनाडा ही था, जिसने दुनिया को दिखाया कि एक बड़े पड़ोसी देश के साथ आर्थिक संबंध होते हुए भी अपनी मुद्रा को बनाए रखना कितना व्यावहारिक होता है। इसके अलावा, बैंकों पर सरकारी नियंत्रण ढीला करने के मामले में भी पूरी दुनिया की तुलना में कनाडा ने अपनी गति धीमी रखी।
यही वजह है कि, 2008 के वित्तीय संकट से कनाडा कुछ हद तक खुद को बचा पाया। इससे यह जरूरी हो जाता है कि हम घाटे और सार्वजनिक निवेश के प्रमुख मुद्दे पर गौर करें। इस मामले में कनाडा की लिबरल पार्टी कहती है, 'ब्याज दरें ऐतिहासिक न्यूनता पर आ चुकी हैं, वर्तमान बुनियादी तंत्र तेजी से पुराना और कमजोर हो रहा है और हमारी अर्थव्यवस्था उदासीनता के जाल में फंसी हुई है। अब निवेश का समय है।'
सवाल उठता है कि क्या लिबरल पार्टी का पक्ष उचित है। जवाब है, 'हां'। दरअसल, हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं, जिसमें बचत का तत्व छाया हुआ है। निजी क्षेत्र निवेश करना नहीं चाहता और सरकार को बहुत नीची दरों पर पैसा उपलब्ध कराने के लिए वह उत्सुक भी है। नीची दरों पर कर्ज लेना अच्छा विचार है, मगर कमजोर मांग के चलते मजदूरों की बेरोजगारी को देखते हुए यह भी जरूरी है कि अतिरेक बचत का उपयोग उन चीजों पर हो, जिससे हमारा भविष्य सुधर सके। कहने में अजीब लग रहा है, मगर यह अभी हो नहीं रहा है। विकसित देशों में 2009 के दौरान जो राजकोषीय स्थिति को मजबूती देने के कार्यक्रम शुरू किए गए, वे पिछले काफी समय से अपनी चमक खो चुके हैं। 2010 से यूरोप और अमेरिका में सकल घरेलू उत्पाद में सार्वजनिक निवेश का हिस्सा कम होता गया है और अब यह संकट से पहले की स्थिति से भी नीचे चला गया है।
आखिर इसकी वजह क्या है? जवाब यह है कि 2010 में अभिजात वर्ग किसी तरह से इस बात पर एकमत था कि नीति नियंताओं के सामने सबसे बड़ी परेशानी घाटे को लेकर है, न कि उच्च बेरोजगारी और नीची विकास दर की। हालांकि इस सोच के पीछे कोई प्रमाण नहीं था। इसके अलावा, ब्याज की नीची दरें बताती थीं कि बाजार कर्ज को लेकर बिल्कुल भी चिंतित नही थे। सभी महत्वपूर्ण व्यक्ति यही कह रहे थे, और फाइनेंशियल मीडिया के ज्यादातर हिस्से में भी यही पढ़ा जा रहा था। हालांकि कुछ राजनेता इस सोच को चुनौती देने की इच्छा जरूर रखते थे। खासकर, जिन्हें सार्वजनिक व्यय के पक्ष में आवाज बुलंद करनी चाहिए थी, उन्हें झटके का सामना करना पड़ा। खास तौर पर ब्रिटेन की लेबर पार्टी ने कन्जर्वेटिव पार्टी के उस दावे को स्वीकार कर लिया, जिसके मुताबिक देश वित्तीय संकट से गुजर रहा है।
इतना ही नहीं, लेबर पार्टी को इस चर्चा पर भी रजामंद होना पड़ा कि कैसी कटौती होनी चाहिए। यहां तक कि अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को भी अस्थायी तौर पर ही सही, मगर रिपब्लिकन की मांग दोहरानी पड़ी। घाटे के इस मुद्दे पर वामपंथी रुझान की मध्यमार्गी पार्टियां खुद को बेहद कमजोर स्थिति में पा रही थीं। दरअसल, कटौती का मुद्दा दक्षिणपंथी नेताओं के लिए बिल्कुल स्वाभाविक था, जो हमेशा से कहते आए हैं कि गरीबों और वंचितों की मदद उनके बस से बाहर है (हालांकि अमीरों के लिए कर छूट में इन्हें कोई आपत्ति नहीं है)। कटौती का समर्थन करने वाले वामपंथी रुझान वाले मध्यमार्गी राजनेताओं को भी अपने पक्ष को कुछ हद तक बदलने पर मजबूर होना पड़ा।
अब कनाडा के नए प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडेऊ के नेतृत्व में लिबरल पार्टी आखिरकार वही चाहती है, जो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे मंचों पर समझदार अर्थशास्त्री कहते आए हैं। इसका दंड उन्हें राजनीतिक तौर पर झेलने की नौबत नहीं आई। इसके उलट, उन्हें तो शानदार जीत मिल गई। सवाल यह है कि क्या लिबरल इस मौके का फायदा उठा पाएंगे। ब्याज दरें अविश्वसनीय ढंग से नीचे हैं। इस वजह से कनाडा अगले दस वर्षों के लिए केवल डेढ़ फीसदी की ब्याज दर से उधार ले सकता है। उम्मीद है कि ट्रुडेऊ अपने कार्यक्रम से बंधे रहेंगे। उनके पास पूरी दुनिया को यह दिखाने का मौका है कि एक पूरी तरह से जिम्मेदार राजकोषीय नीति क्या होती है।