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आर्थिक विकास: क्या दक्षिण को उत्तर दे पाएगा उत्तर प्रदेश

संजय अभिज्ञान
Updated Thu, 02 Mar 2023 05:17 AM IST

सार

हालांकि निवेश के बड़े वादे धरातल पर उतरने में समय लेते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश का निवेश महाकुंभ उद्योग-धंधों के स्वागत की एक गंभीर कोशिश दर्शाकर संपन्न हुआ है। इसने पहली बार यह उम्मीद जगाई कि उत्तरी राज्य खुशहाली के मोर्चे पर दक्षिणी राज्यों को टक्कर दे पाएंगे।
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Kolkata- UP Investors Summit - फोटो : Agency


भारत राष्ट्रराज्य के इतिहास की यह एक सत्यकथा है। 75 साल पहले आजादी मिलने के समय तो सभी राज्य कमोबेश एक जैसे ही पिछड़े और साधनसीमित थे। मगर सत्तर के दशक के आरंभ से, दक्षिणी राज्यों के आर्थिक-सामाजिक सूचकांक सुधरते चले गए। शिशु मृत्यु दर, जच्चा मृत्यु दर, जीवन संभाव्यता, पांच वर्ष के आयु से पहले की मृत्युदर, जन्म दर, कन्या भ्रूण हत्या दर, रोग प्रतिरोधक टीकाकरण की दर, प्रति व्यक्ति आय, प्राथमिक स्कूलों में दाखिले की दर- लगभग हर पैमाने पर केरल, तमिलनाडु, आंध्र और कर्नाटक संभलते गए। शिशु मृत्यु दर का केरल का आंकड़ा छह से सात के दायरे में है, जो अमेरिका से टक्कर लेता है। मगर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का यह आंकड़ा आज भी चिंताजनक है और अफगानिस्तान, सूडान, नाइजर जैसे देशों के समकक्ष है।


केरल की अगुआई में दक्षिण ने जनसंख्या नियंत्रण  में भी अग्रणी भूमिका निभाई। वर्ष 1971 में केरल और राजस्थान की आबादी करीब बराबर थी। आज राजस्थान की आबादी केरल से दोगुनी है। इस बीच बंगलूरू की पहचान भारत की सिलिकॉन वैली की बन गई। हैदराबाद साइबराबाद हो गया। केरल साक्षरता का रोल मॉडल बनकर उभरा। तमिलनाडु स्कूलों में मिड डे मील जैसी स्कीम लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना और देखते-देखते उसने स्कूली दाखिलों में इजाफे के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।


देशों या अंचलों की आर्थिक तुलना कोई पाप नहीं। आधुनिक अर्थशास्त्र की नींव में ही ऐसी जिज्ञासाएं हैं। इसकी सबसे अच्छी मिसाल है 1776 में लिखी गई अर्थशास्त्र के पितामह एडम स्मिथ की कालजयी पुस्तक-एन इंक्वायरी इंटू द नेचर ऐंड कॉजेस ऑफ वेल्थ ऑफ नेशंस। उसके कोई दो सदी बाद भी जीडीपी-जीएनपी की अवधारणा को जन्म देने वाले नोबेल विजेता अर्थशास्त्री साइमन कुजनेट्स भी विभिन्न देशों की आय का तुलनात्मक अध्ययन ही कर रहे थे। लिहाजा, यदि दक्षिण भारत के डाटा वैज्ञानिक नीलकांतन आरएस ने हाल में प्रकाशित अपनी किताब-साउथ वर्सेज नॉर्थ-इंडियाज ग्रेट डिवाइड- में उत्तर के मुकाबले दक्षिण भारत को अधिक खुशहाल साबित किया है, तो इसमें कोई हर्ज नहीं। आखिर कुछ बरस पहले, अर्थजगत के दो दिग्गज-अमर्त्य सेन और जगदीश भगवती-भी तो क्रमश: केरल व गुजरात को आमने-सामने रखकर बहुचर्चित 'सेन-भगवती डिबेट' को आकार दे रहे थे। जगदीश भगवती जहां गुजरात मॉडल की तर्ज पर सामाजिक न्याय के बजाय तेज आर्थिक विकास को वरीयता देने का तर्क दे रहे थे, वहीं अमर्त्य सेन केरल की मिसाल देकर कह रहे थे कि तेज आर्थिक विकास नहीं, शिक्षा-स्वास्थ्य को वरीयता देकर सामाजिक न्याय को सर्वोपरि रखने की नीति से ही सच्चा विकास होता है।


बहरहाल, इस पूरी बहस में नया मोड़ यह है कि उत्तर भारत को पिछड़ा बताने की सात्विक अर्थशास्त्रीय बहस अब दुराग्रहों की तरफ जा रही है। मसलन साउथ वर्सेज नॉर्थ  के लेखक नीलकांतन कहते हैं कि दक्षिणी राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण की सजा मिल रही है। आरोप है कि चूंकि 15वें वित्त आयोग ने 2011 की जनगणना के आंकड़ों को धनराशि आवंटन का आधार बनाया है, कम आबादी वाले दक्षिण भारतीय राज्यों को कम केंद्रीय संसाधन मिल रहे हैं, जबकि उत्तर प्रदेश औसत आर्थिक सूचकांकों के बावजूद महज आबादी के अनुपात की बदौलत ज्यादा केंद्रीय संसाधनों पर कब्जा कर रहा है। आरोप यह भी है कि जीएसटी व्यवस्था के कारण दक्षिण राज्यों की हैसियत नगरपालिकाओं जैसी हो गई है। यह आशंका भी जताई जा रही है कि परिसीमन आयोग की आगामी कार्रवाई में अपेक्षाकृत कम आबादी होने के कारण दक्षिणी राज्यों की संसदीय व विधानसभा सीटें भी कम हो सकती हैं। कुल मिलाकर आरोप है कि केरल सरीखे कक्षा में अव्वल रहने वाले छात्रों को तो सजा मिल रही है और यूपी-राजस्थान जैसे फिसड्डी छात्रों को इनाम दिए जा रहे हैं।


दक्षिण बनाम उत्तर के इस वैचारिक समुद्रमंथन से निकले विषामृत को गंभीरता से देखना-समझना चाहिए। यह बहस बताती है कि 70 के दशक में स्वास्थ्य और शिक्षा के ढांचे को तरजीह की रणनीति ने दक्षिण की नींव को मजबूत किया। एक तर्क यह है कि एक सदी पहले पेरियार जैसे महानायकों के नेतृत्व में आरंभ हुए द्रविड़ आंदोलन से उपजी जागरूकता ने साठ के दशक में निम्न मध्यम वर्ग को शिक्षित बनाकर क्षेत्रीय विकास की पूर्वपीठिका तैयार की, जबकि उत्तर भारत में आंबेडकर, लोहिया के दर्शन को राजनीतिक यथार्थ में उतारने वाले राजनीतिक आंदोलनों ने कुछ विलंब से आकार लिया। तर्क यह भी है कि दक्षिण के राजनीतिक जनमानस पर हावी शिक्षा-स्वास्थ्य के ठोस आग्रहों की तुलना में उत्तर भारत की राजनीतिक-सामाजिक चेतना पर मंडल-कमंडल के भावनात्मक आग्रहों के हावी होने से अंतर बढ़ा।


इसी पृष्ठभूमि में, मूल सवाल पर लौटना होगा कि क्या निवेश का नया चुंबकप्रदेश बनकर उभरा उत्तर प्रदेश दक्षिण दर्प का मर्दन करने को तैयार है। क्या वह फिसड्डी या बीमारू का ठप्पा मिटाने के निर्णायक मुकाम पर आ गया है? क्या बीते पखवाड़े लखनऊ में योगी सरकार के अफसरशाहों के हाथों में थमाए गए 18,643 निवेश आशय पत्र कागज का पुलिंदा मात्र हैं या वाकई वे धरातल पर उतरकर करोड़ों गरीबों को रोजगार देंगे? पिछला रिकॉर्ड तो एमओयू के आंकड़ों को संशय से देखने की सलाह देता है। लेकिन वादों को वफा होते भी देखा गया है और देश-विदेश में यूपी सरकार ने रोड शो के आयोजनों में जिस तरह पापड़ बेले हैं, उससे प्रयासों की ईमानदारी तो झलकी ही है। मगर उत्तर प्रदेश के लिए दक्षिण का एक सबक स्पष्ट है। जनशिक्षा और जनस्वास्थ्य को केंद्र में रखने वाला समावेशी विकास सुनिश्चित किए बगैर ये निवेश परियोजनाएं सार्थक नहीं होंगी।

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