राजा-महाराजाओं के बारे में यह प्रसिद्ध रहा है कि वे लोगों का हालचाल जानने के लिए राजधानी और दूसरे शहरों में लोगों के बीच निकला करते थे। महाराजा रणजीत सिंह भी निकले। वह साधारण वेशभूषा में थे। उनके साथ कुछ सिपाही भी थे। महाराज एक जगह से गुजर रहे थे कि सामने से एक पत्थर आकर उन्हें लगा। सिपाहियों ने चारों ओर नजर दौड़ाई। एक बुढिया दिखाई दी। सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और हिरासत में ले लिया। महाराजा रणजीत सिंह उस पत्थर से चोटिल होने के बावजूद राज्य के लोगों का हाल जानने में लगे रहे। हालांकि उनकी चोट का उपचार कर दिया गया था।
राजभवन लौटने पर उन्होंने दरबार में उस स्त्री को तलब किया, जिसने पत्थर फेंका था। कर्मचारियों ने उसे कैदखाने से लाकर राजसभा में पेश किया। महाराज को देखते ही बुढ़िया डर के मारे कांप उठी। महाराज कुछ पूछें, उससे पहले ही कांपती आवाज में उसने कहा, सरकार, मेरा बच्चा कल से भूखा था। घर में खाने के लिए कुछ नहीं था। पेड़ पर पत्थर मार रही थी कि कुछ जामुन तोड़कर उसे खिलाऊं। वह पत्थर भूल से आपको जा लगा। मैं बेगुनाह हूं, मुझे क्षमा किया जाए।
महाराज चिंता में पड़ गए। थोड़ी देर बाद वह बोले, इसे एक हजार रुपये देकर सम्मान के साथ छोड़ दिया जाए। कर्मचारियों ने आश्चर्य से कहा, महाराज, जिसे दंड मिलना चाहिए, उसे रुपये?
महाराज बोले, यदि वह वृक्ष पत्थर लगने पर मीठे फल दे सकता है, तब मुझे तो विशेष कुछ करना चाहिए। परमात्मा ने इस राज्य की देखभाल और नागरिकों की जरूरतें पूरी करने का जिम्मा मुझे सौंप रखा है। उसे दंडित करने का मुझे कोई अधिकार नहीं है।