शिव और पार्वती के विवाह का भव्य आयोजन चल रहा था। शिव पशुपति हैं, सभी जीवों के देवता, इसलिए सभी तरह के जीव-जंतु, देव, असुर और जल-थल-नभ के प्रतिनिधि उस विवाह में शामिल हुए। विवाह समारोह में एक रस्म के तहत वर-वधू, दोनों की वंशावली बताई जानी थी। पार्वती की वंशावली सुनने के बाद वहां मौजूद सभी लोग शिव के वंश के बारे में सुनने के लिए उत्सुक थे। मगर शिव चुप रहे। शून्य में वह ताकते रहे।
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वधू पक्ष के लोग बार-बार उनसे पूछते रहे, मगर शिव ने मौन नहीं तोड़ा। उन्हें मौन देखकर वहां मौजूद राजा-महाराजा और पंडित शिव के प्रति तिरस्कार के भाव से भर उठे। तब वहां मौजूद नारद मुनि ने अपनी वीणा उठाई और एक ही सुर में बजाना शुरू किया। उस धुन को कुछ देर तक सुनने के बाद पर्वतराज ने खीझकर कहा, हम वर के वंश और पुरखों के बारे में सुनना चाहते हैं, और आप हैं कि यह शोर कर रहे हैं।
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यह सुनकर नारद जी मुस्कराए, फिर उन्होंने कहना शुरू किया, वर के माता-पिता नहीं हैं। इनकी कोई विरासत नहीं है, न ही कोई कुल-गोत्र। यह सुनकर पूरी सभा चकरा गई। पर्वतराज ने कहा, हो सकता है कि वर अपने पिता या माता के बारे में न जानते हों। मगर हर कोई किसी न किसी से जन्मा है। यह कैसे हो सकता है कि उनका कोई पिता या मां ही न हो?
नारद ने कहा, क्योंकि वह स्वयंभू हैं। उन्होंने खुद की रचना की है। उनके न तो पिता हैं, न माता। वह एक योगी हैं और सारे अस्तित्व को उन्होंने अपना एक हिस्सा बना लिया है। उनके लिए सिर्फ एक ही वंश है- नाद, जो प्रकृति के साथ जन्मा। प्रकृति के साथ ही शिव प्रकट हुए पुरुष के रूप में। यह सुनकर पर्वतराज समेत वहां मौजूद सभी लोग विभोर हो उठे।