आधुनिकीकरण के संदर्भ में, सेना को अपने पर्यवेक्षण, अपनी शक्ति और प्रति-आक्रामक क्षमताओं को बढ़ाने की आवश्यकता है, वायुसेना अपने घटते संसाधनों की पूर्ति करना चाहती है, जबकि नौसेना हिंद महासागर क्षेत्र में चीनी उपस्थिति का मुकाबला करने की अपनी क्षमता विकसित करना चाहती है। साथ ही आतंकवाद की चुनौती से निपटना है। इन सबके लिए धन की जरूरत होती है। 2022-23 का बजट 5,25,166 करोड़ रुपये (70.6 अरब डॉलर) था, जो कि सकल घरेलू उत्पाद का 1.6 फीसदी था। 54 फीसदी बजट वेतन और पेंशन के लिए चिह्नित था, 24 फीसदी आधुनिकीकरण और महज तीन फीसदी अनुसंधान और विकास के लिए। पिछले वर्षों में आवंटन में बढ़ोतरी हुई है, पर मुद्रास्फीति के कारण यह बेअसर है। वन रैंक वन पेंशन बजट में पेंशन का हिस्सा बढ़ाएगा। आम तौर पर रक्षा बजट का करीब 50 फीसदी थल सेना को, 23 फीसदी वायुसेना को और 19 फीसदी नौसेना को मिलता है। बाकी राशि रक्षा मंत्रालय के अन्य संगठनों के लिए होती हैं।
इस साल रक्षा के लिए 5.94 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो कि पिछले साल से 13 फीसदी अधिक है। हालांकि बजट में इसकी हिस्सेदारी आठ फीसदी ही रहेगी। 2,70,120 करोड़ रुपये का राजस्व खर्च वेतन और बलों के प्रबंधन के लिए है। आधुनिकीकरण के लिए पूंजीगत हिस्सा पिछले साल की तुलना में 10,000 करोड़ रुपये बढ़ाया गया है, जो अब 1.62लाख करोड़ रुपये हो गया है। वास्तव में यह न्यूनतम वृद्धि है। यह समझ से परे है कि वित्तमंत्री क्यों अब भी विभिन्न सेवाओं के लिए आवंटन करती हैं, जबकि सीडीएस की नियुक्ति ही तीनों सेवाओं के संयुक्त नियोजन और खरीद का प्रबंधन करने के लिए हुई है। सशस्त्र बलों के लिए यह आवश्यक है कि वे संयुक्त क्षमता विकास की दिशा में काम करें और साथ ही व्यय को कम करने के उद्देश्य से ढांचे में बदलाव करें।