महामारी के वर्षों (2020-22) के दौरान स्थिर महंगाई (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति 6.52 फीसदी) और बेरोजगारी (शहरी 8.1 फीसदी, ग्रामीण 7.6 फीसदी) ने हालात को बदतर ही किया। 2023 की शुरुआत अनिष्टसूचक है। बड़ी कंपनियां अपने कर्मचारियों की हजारों की संख्या में छंटनी कर रही हैं। उच्च बेरोजगारी दर शिक्षित मध्य वर्ग को भी प्रभावित कर रही है।
गरीब कौन हैं?
भारत में बढ़ती असमानता ने कई सच उजागर किए हैं। ऑक्सफेम की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के पांच सर्वाधिक अमीर लोगों के पास देश की साठ फीसदी से अधिक संपत्ति है, जबकि निचले क्रम की पचास फीसदी आबादी के पास सिर्फ तीन फीसदी संपत्ति है। अपनी इनइक्वालिटी रिपोर्ट, 2022 में चांसेल, पिकेटी और अन्य ने अनुमान व्यक्त किया कि निचले क्रम के पचास फीसदी लोगों को राष्ट्रीय आय का सिर्फ 13 फीसदी हिस्सा मिलता है। शीर्ष पांच से दस फीसदी (सात से 14 करोड़ लोग) अपनी संपत्ति का प्रदर्शन करते हैं, खर्च और उपभोग करते हैं, जिससे बाजार में 'चमक' आती है। (भारत में लेम्बोर्गिनी के सालाना उत्पादन की 2023 के लिए बिक्री पूरी हो चुकी है और कंपनी अब 2024 में डिलीवरी करने के ऑर्डर ले रही है। भारत में इसके सबसे निचले मॉडल की एक्स-शो रूम कीमत 3.15 करोड़ रुपये है।) ये अतिसंपन्न हैं। निचले पचास फीसदी में गरीब शामिल हैं।
सीएमआईई के मुताबिक भारत में कुल श्रमबल 43 करोड़ है। उनमें से जिनके पास रोजगार है या जो रोजगार की तलाश में हैं, उनका हिस्सा 42.23 फीसदी है, जो कि दुनिया के न्यूनतम में से है। 7.8 फीसदी घरों में (करीब 2.1 करोड़ घरों में) कोई नौकरीपेशा व्यक्ति नहीं है। 30 फीसदी नियोजित (करीब 13 करोड़) दैनिक वेतन भोगी श्रमिक हैं। औसत मासिक घरेलू उपभोग व्यय 11,000 रुपये है। ये परिवार गरीब हैं।
सरकार के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएस-5) ने खुलासा किया कि 15 से 49 वर्ष उम्र की महिलाओं में बड़ी संख्या (57 फीसदी) रक्ताल्पता से ग्रस्त थीं। छह से 23 माह के सिर्फ 11.3 बच्चों को पर्याप्त भोजन मिल पा रहा था। कम वजन वाले (32.1 फीसदी), नाटे (35.5), कमजोर (19,3) और गंभीर रूप से कमजोर (7.7) बच्चों का अनुपात खतरनाक रूप से अधिक था। इन वर्गों को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता। वे गरीब हैं।
बजट ने गरीबों को दंडित किया
अब जरा बजट-2023-24 के लेखकों से पूछिए कि आपने गरीबों के लिए क्या किया, सबसे नीचे की पचास फीसदी आबादी के लिए क्या किया, बेरोजगारों के लिए क्या किया और उन लोगों के लिए क्या किया, जिन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिलता। इनके जवाब बजट दस्तावेज के आंकड़ों में है। मिसाल यहां पेश है:
प्रमुख मदों के तहत, जो गरीबों के लिए रोजगार सृजित करने के साथ-साथ उन्हें राहत प्रदान करते हैं, आवंटित धन को 2022-23 के दौरान खर्च नहीं किया गया:
वर्ष के प्रारंभ में आवंटन अप्रासंगिक हैं, यदि वर्ष के अंत तक जो खर्च किया गया है वह आवंटित राशि से काफी कम है। गरीबों को कम धन दिया गया।
2023-24 के लिए दृष्टिकोण में बदलाव का कोई सबूत नहीं है:
पेट पर चोट
यदि आवंटित राशि खर्च की जाती है, तो ही रोजगार सृजित होंगे या कल्याणकारी लाभ अर्जित होंगे। इसके अलावा कोई भी आवंटन यदि पिछले वर्ष के आवंटन से अधिक दिख रहा है, तो उसे मुद्रास्फीति के साथ संतुलन बनाकर देखना होगा, लेकिन कई मामलों में पता चलेगा कि आवंटन वास्तव में कम है। गरीबों को सीधे लाभ पहुंचाने वाले सारे कार्यक्रमों को कम धन दिया गया है, मुद्रास्फीति को देखें तो यह और भी कम होगा। इसके साथ यह भी देखिए कि जीएसटी (कुल संग्रह का 64 फीसदी निचले क्रम की पचास फीसदी आबादी से आता है) में किसी तरह की कटौती नहीं की गई है। पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दामों में या कर में किसी तरह की कटौती नहीं की गई है। यह ऐसा है मानो वित्तमंत्री महामारी के बाद गरीबी, असमानता, बेरोजगारी, छंटनी, कुपोषण, रक्ताल्पता और बाल-अवरुद्धता और बाल-कमजोरी में वृद्धि से अनजान हैं।
क्या कोई आश्चर्य है कि 90 मिनट के भाषण में वित्तमंत्री ने सिर्फ दो बार 'गरीब' शब्द का उल्लेख किया? एक तमिल कहावत इस बजट का सबसे अच्छा वर्णन करती है, जिसका अर्थ है: गरीबों के पेट पर चोट।