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भैया, इधर भी दुकान खुली है

Sat, 23 Feb 2013 11:12 PM IST
यशवंत व्यास
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ये भी खा गए!
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कवि ने सोचा चलो कवि सम्मेलन की एक तुकबंदी और बनी। कवि को भाजपा ने काफी मदद की थी। पहले जब बोफोर्स हुआ, जैन डायरी हुई, अयोध्या हुई, सब पर कवि ने लिखा। उसकी कविता तबीयत से चली। पुलिस वालों ने बलात्कार किया, कविता चली। कारगिल हुआ, कविता चली। कश्मीर ऑलटाइम हिट है। कुछ दिनों से भाजपा मदद पर मदद किए जा रही है। पीएम हाउस से लेकर रक्षा मंत्रालय तक कविता बिखरी पड़ी है।

अटल जी जब कविता लिखते थे, रामराज्य से काल-कपाल आदि तक कवि का रोम-रोम गा रहा था। अब कविता का महाकाव्य बन गया। रामराज्य की चौपाइयों में लक्ष्मण का लाख रुपए वाला दोहा पसर कर बैठ गया है, रसीद की जरूरत भी नहीं। इसे मंदिर-साहित्य के गुप्तदान में दिखाना पड़ेगा। इस दोहे पर समाजवादी भाई को सवैया रचना पड़ रहा है। कवि कहता है, ‘आह से उपजा होगा गान!’ संघी-समाजवादी संयोजक कहता है, ‘यदि तावदयं स्वप्नो प्रति बोधनम्।’ नॉर्थ ब्लॉक-साउथ ब्लॉक में तड़ातड़ तालियां गूंज रही हैं।
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एक कवि दूसरे कवि से कहता है, यह साजिश है। कविता के विरुद्ध राजनीतिक षडयंत्र हो रहा है। रिश्वत खाने वालों से पहले देने वालों से पूछो कि वे रुपये देने के लिए लाए कहां से थे? क्या उन पर इन्कम टैक्स चुकाया गया था? पहला कवि पूछता है, ‘साधो, देखो पूरब में कितनी सुंदर लालिमा छाई है। पंछी कलरव कर रहे हैं। माल लेने वाले कृपा करके यह बताएं कि क्या वे इसी तरह माल लेते हैं और इतने कच्चे क्यों हैं कि लेते हुए धरे भी जाते हैं।’ दूसरा कवि कह रहा है, ‘यही समय का फेर है। संतों ने कहा है, अनुभव बड़ी जरूरी चीज है। खाया तो अरसे से जा रहा है, पर ये एक-दो लाख रुपये के मामूली माल में धरे गए। उन्होंने पार्टी को लजा दिया।’

बुद्धिजीवियों के बीच सरकार की सही खबरें पहुंचाने के लिए मंत्री बेचैन हैं। अब कवियों के विचार का प्रश्न यह है कि क्या सचमुच पार्टी लजाती है? लज्जा के विभिन्न उदाहरण हैं। लज्जा का संबंध लूट से नहीं होता। जैसे शिल्पा शेट्टी न्यूनतम वस्त्र धारण कर के यूपी, बिहार आदि लूटने के बाद जब अक्षय कुमार का प्रेम निवेदन सुनती है, तो लजा जाती है। लज्जा का अपना शास्त्र है। वह सुविधानुसार आती है, असुविधानुसार कष्ट दे जाती है। प्रधानमंत्री को बहुत लज्जा-कुशल होना चाहिए।

वह कब लज्जित हो जाए, कब लज्जा को अपने सचिवों के हवाले कर राजपथ पर टहलने निकल पड़े, कुछ कहा नहीं जा सकता। लज्जा को वह तेरह कोणों से देखता और छब्बीस किरणों से बिखेर सकता है। जैसे उसे दाल में काला और काले में दाल का अनुपात बदलना आता है। वैसे ही उसके लिए लज्जा वसंत का पहला फूल है। उसे वह सूंघता हुआ आंखें मूंद लेता है। पार्टी को लजाना चाहिए या नहीं यह उसके लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना दांतों की सफाई के बाद दातुन।

कवि सोचते हैं, पार्टी के चंदे और दलाली के अंतर्संबंधों पर विचार होना चाहिए। सोने की चैन पहनकर मेजर की बीवी रक्षा सौदों को प्रभावित कर सकती है पर पार्टी के लिए रक्षामंत्री के घर चंदा लेने से रक्षा सौदों पर रत्ती भर भी असर नहीं पड़ेगा। सो कैसे? जैसे आर्कमिडीज और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ दोनों को साथ बिठाने से यह साबित नहीं होता कि राम की मूर्ति को पानी में डुबोने से जितना पानी हटता है, उसका आयतन राम की शक्ति पूजा के बराबर होगा।

कवि वैज्ञानिक होना चाहते हैं। वे ऐसे फॉर्मूले पर विचार करते हैं। वे बीज गणित के कूट अंकों को नैतिकता, बहस, जांच और जिम्मेदारी के जंगल में भटकने छोड़ देना चाहते हैं। फिर गोलगप्पे की दुकान में बैठकर प्रश्नावली हल करने के मामले पर संयुक्त संसदीय समिति बनाना चाहते हैं। समिति तोप की दलाली पर जांच नहीं करती, वह कहती है तोप की क्वालिटी अच्छी है। लोगों ने दस-बीस करोड़ की दलाली खा ली तो क्या हो गया, माल तो अच्छा आ गया।
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कवि कहता है, ‘ऊपर उठने के लिए माल जरूरी है। हर दुकान के लिए माल चाहिए। माल देखकर ग्राहक आएगा। ग्राहक आएगा तो दुकान उठेगी। पार्टियां, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स हैं। उन्हें ऊपर उठाने की मजबूरी है।’ एक कवि दूसरे कवि से कहता है, ‘भैया इधर अपनी दुकान भी खुली है। सरकार गिरनी नहीं चाहिए। वरना अगली बार अपनी पद्मश्री का क्या होगा?’ दूसरा कवि कहता है, ‘सच्ची दुकानें कभी बंद नहीं होती। एक गया, दूसरा देने वाला आएगा। ग्राहकों की संतुष्टि ही हमारा ध्येय है।’ अब दृश्य यह है कि दोनों कवि मूंगफली खा रहे हैं और इस मार्च में इन्कम टैक्स में कैसे छूट पाएं इस पर बहस कर रहे हैं।
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