रोजमर्रा के जीवन में कितनी ही बार हमारा सामना ऐसी महिलाओं से होता है, जो घरों में झाड़ू-पोंछा करके या फुटपाथ पर सब्जियां बेचते हुए अपना और अपने परिवार का पालन-पोषण करती हैं। हम इतने व्यस्त होते हैं कि इनके चेहरे पर उम्र से पहले ही खिंच आईं प्रौढ़ता की लकीरों के पीछे छिपे दर्द को महसूस नहीं कर पाते। लेकिन अहमदाबाद की इला रमेश भट्ट ने स्वरोजगार से जुड़ी महिलाओं के इस दर्द को समझा।
वकील पिता की इस बेटी ने हिंदू कानून में स्वर्ण पदक हासिल किया। हालांकि जल्दी ही उन्होंने समझ लिया कि कानूनी विशेषज्ञता का लाभ तभी है, जब उससे किसी का जीवन संवरे। यही सोच उन्हें अंतरराष्ट्रीय श्रम कानून का विशेष अध्ययन करने के लिए इस्राइल खींच ले गई, और वहां से वापसी के बाद टेक्सटाइल क्षेत्र से जुड़ी उन महिलाओं के कानूनी हक के लिए उन्होंने काम शुरू किया, जो किसी कंपनी से जुड़ी नहीं थीं और अपने घर से कोसों दूर जाकर हाड़-तोड़ मेहनत कर रही थीं।
उन्होंने पाया कि सरकार का कानून केवल उन महिलाओं की बेहतरी का ही ख्याल रखता है, जो संगठित क्षेत्र में काम करती हैं। जबकि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली स्वरोजगार प्राप्त महिलाओं की संख्या कहीं ज्यादा है। यहीं से 'सेवा' यानी सेल्फ इंप्लॉयड वूमैन्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया का सफर शुरू हुआ। शुरुआत में 600 सदस्यों वाले सेवा से मिलने वाली आर्थिक मदद से आज लगभग 13 लाख गरीब महिलाएं लाभ उठा रही हैं।
इला रमेश भट्ट का और भी परिचय है। वह वूमेन्स वर्ल्ड बैंकिंग की संस्थापकों में से भी हैं, जो जरूरतमंद महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए धन की व्यवस्था करता है। असहाय महिलाओं के साथ खड़े होने की उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें पूरी दुनिया में इतना चर्चित किया कि पिछले साल हिलेरी क्लिंटन ने कहा कि इला भट्ट उनके जीवन की उन अनेक नायिकाओं में से एक हैं, जिन्होंने उन्हें प्रेरित किया है।
पद्मश्री, पद्म भूषण, रेमन मैग्सायसाय, राइट लिवलीहुड और हाल ही में शांति, निःशस्त्रीकरण और विकास के लिए प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी पुरस्कार से सम्मानित इला भट्ट को अस्सी की उम्र में भी यह सवाल विचलित करता है कि भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था का हृदय क्या समाज की सबसे गरीब महिलाओं को देखकर पसीजता है, अगर नहीं, तो फिर इन आर्थिक सुधारों से क्या फायदा!