सबसे खास बात इसकी व्यापकता है, जिसके तहत, न्यूजीलैंड के बाजारों में भारत की लगभग 100 फीसदी वस्तुओं पर शून्य आयात शुल्क लगेगा। यह आंकड़ा पिछले कई दशकों में किसी भी प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्था के साथ भारत द्वारा हासिल की गई सबसे बड़ी टैरिफ छूट है। इसके अलावा, सिर्फ नौ महीनों में एफटीए जैसे जटिल समझौते को अंतिम मुकाम तक ले आना भी ऐतिहासिक ही है। भारत के लिए यह समझौता एक उच्च आय वाले व नियम-आधारित बाजार तक पहुंच को मजबूत और उसकी व्यापक हिंद-प्रशांत आर्थिक रणनीति का समर्थन भी करता है।
दूसरी ओर, न्यूजीलैंड के लिए यह समझौता, वैश्विक व्यापार अनिश्चितता के बढ़ते दौर में दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक में अधिक सुरक्षित प्रवेश साबित हो सकता है। न्यूजीलैंड ने अगले पंद्रह वर्षों में भारत में 20 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है, जिससे अगले पांच वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार दोगुना होने की उम्मीद है। हालांकि, नहीं भूलना चाहिए कि न्यूजीलैंड विश्व में सबसे कम औसत शुल्क वाले देशों में से है, जो करीब 2.3 प्रतिशत है, लिहाजा केवल शुल्क हटाने से तत्काल निर्यात वृद्धि नहीं हो सकती है।
दूसरी तरफ, भारत और न्यूजीलैंड के बीच द्विपक्षीय व्यापार बहुत कम है, जो 2024-25 में मुश्किल से 1.3 अरब डॉलर था। दरअसल, मुक्त व्यापार समझौते का होना निस्संदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे भारत-न्यूजीलैंड के आर्थिक संबंधों की पूरी क्षमता का लाभ उठाना संभव नहीं भी हो सकता है। ऐसे में जरूरी है कि व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने के लिए इस समझौते के साथ-साथ निर्यात बढ़ाने के लिए कुछ व्यावहारिक कदम भी उठाए जाएं। इसके लिए, भारत न्यूजीलैंड को फार्मास्यूटिकल्स, वस्त्र और आईटी सेवाओं का निर्यात आसानी से बढ़ा सकता है। कुल मिलाकर, यह समझौता भारत के वैश्विक व्यापार नजरिये का संकेतक है, जो बताता है कि देश अब आत्मनिर्भरता तथा वैश्वीकरण के बीच संतुलन साधते हुए आगे बढ़ना चाहता है।