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किताबें तैयार हैं, कैमरा भी तैयार है: ओटीटी से बदल रहा परिदृश्य, हिंदी लेखकों और नई कहानियों के लिए शुभ संकेत

सार

ओटीटी के विस्तार ने किताबों के लिए परदे पर पहुंचने के नए रास्ते खोले हैं। किताबों में सांस लेती कहानियां जब स्क्रीन पर आती हैं तो उनकी गूंज दूर तक जाती है। यह बदलता परिदृश्य हिंदी लेखकों और नई कहानियों के लिए शुभ संकेत हैं।
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साहित्य और ओटीटी का अनोखा रिश्ता - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-ग्राफिक्स
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विस्तार
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हिंदी सिनेमा और ओटीटी में पिछले कुछ वर्षों में किताबों के एडाॅप्टेशन का सिलसिला बना है। भारत के अलग-अलग हिस्सों की जमीनी कहानियां अंग्रेजी से ही नहीं, दूसरी भारतीय भाषाओं से हिंदी या बॉलीवुड की विषय-वस्तु बनने लगी हैं। इसमें बड़ी भूमिका मुझे मामी फिल्म फेस्टिवल के वर्ड टू स्क्रीन की लगती है, फिर कुछ एजेंट्स भी सक्रिय होने लगे, जिन्होंने किताबों के राइट्स लेकर प्रोडक्शन हाउसेस के साथ कवायद शुरू की। यह आज बात करने का अवसर इसलिए बना है, क्योंकि नेटफ्लिक्स ने ‘मुसाफिर कैफे’ सीरीज के सीजन 2 की घोषणा की है, जो अपने आपमें एक घटना है। न जाने कब से हिंदी की किसी समकालीन किताब की परदे पर ऐसी धमक का इंतजार था। लेखक दिव्य प्रकाश दुबे की किताब पर आधारित सीरीज के पहले सीजन के दर्शकों द्वारा अच्छे रेस्पाॅन्स की वजह से यह हुआ है। हम हिंदी वालों के इस खबर को उत्साह से देखे जाने में स्वाभाविकता है। किताब चाहे साहित्यिक हो या लोकप्रिय लेखन की, उसका सिनेमाई रूपांतरण उसकी संवेदना और उद्देश्य को बड़े वर्ग तक तो पहुंचाता ही है, लेखक को उसकी मेहनत का बहुआयामी पारिश्रमिक और संतोष भी देता है।

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ऐसा नहीं है कि इन वर्षों में यह पहली हिंदी किताब हो, सत्य व्यास की ‘चौरासी’ का ओटीटी रूपांतरण ‘ग्रहण’ भी खूब सराहा गया था। ‘मुसाफिर कैफे’ के साथ खास बात है कि दूसरा सीजन भी आ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में किसी समकालीन हिंदी कहानी के सिनेमाई रूपांतरण में मुझे एक नाम ‘पटाखा’ का भी याद आता है। चरण सिंह पथिक की कहानी ‘दो बहनें’ पर विशाल भारद्वाज ने यह फिल्म बनाई थी। गुलजार साहब के लिखे गीतों ने इस फिल्म की संवेदनात्मक गहराई और ऊंचाई, दोनों बढ़ा दी थी।

मेरी राय है कि ‘तीसरी कसम’ की बॉक्स ऑफिस पर असफलता ने हिंदी किताबों से फिल्मी परदे के रूपांतरण को कुप्रभावित किया, अगर ‘तीसरी कसम’ सफल होती तो हिंदी साहित्य और हिंदी लोकप्रिय लेखन दोनों की हिंदी सिनेमा में बेहतर जगह होती, हिंदी लेखक ज्यादा बेहतर सामाजिक और आर्थिक सम्मान अर्जित कर पाते। ऐसा नहीं है कि सिनेमाई रूपांतरण के लायक कृतियां हमारे यहां लिखी नहीं गईं, दरअसल उनकी पहुंच नहीं बनी, उनके लिए सहयोगी ईको सिस्टम नहीं बन पाया। उनमें सरकारी मदद से बनी ‘माया दर्पण’ जैसी फिल्में अपवाद ही हैं।
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एक लंबे अरसे तक हिंदी सिनेमा में उर्दू लेखक, शायर तो जाते रहे, हिंदी लेखक और कवि नाममात्र को गए। हाल के दशकों में हिंदी सिनेमा बनाने वाले और लिखने वाले, दोनों में अंग्रेजी पढ़कर (ज्यादातर विदेश से) आए भारतीय लोगों की बहुलता ने हिंदी किताबों की भागीदारी और मुश्किल कर दी। भारतीय कहानियां, किताबें, हिंदी इलाके की कहानियां अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं के अंग्रेजी अनुवाद या मूल से हिंदी सिनेमा में फिर भी जगह बनाती रहीं।

हाल के वर्षों में ओटीटी की वजह से खिड़कियां खुलीं तो नई हवा के झोंकों में हिंदी किताबों के लिए जगह बननी शुरू हुई। बेशक उनमें व्यक्तिगत प्रयासों की बड़ी भूमिका रही- लेखक और प्रकाशक। हिंदी संसार की कहानियों को लेकर मुझे लगता है कि बहुत सारा लेखन आलोचकों, अध्यापकों और पीयर ग्रुप्स की स्वीकृति के लिए लिखा जाता है। पाठक गिनती में नहीं होता। इससे होता यह है कि सिनेमा या ओटीटी आदि के रूपांतरण में वैसा लेखन बहुत उपयोगी नहीं रह जाता, फिर ‘उसमें मूल से न्याय होने, न होने’ जैसी शुद्धतावादी बहसें तो लगातार साहित्यिक गलियारों में रहती ही हैं। नतीजा यह होता है कि किताबों से परदे की दूरी कम होने के बजाय बढ़ती जाती है।

इस प्रवृत्ति के बरक्स पिछले लगभग डेढ़ दशक में हिंदी प्रकाशन संसार में प्रति प्रवृत्ति दिखाई देती है। पाठकोन्मुख लेखन की, जो पुराने मायनों में पल्प नहीं है, यह अलग किस्म का लोकप्रिय लेखन है, जिसने नए युवाओं में अलग पाठक वर्ग खोजा भी है और तैयार भी किया है। एक नए लेखक वर्ग का हौसला भी इससे बना है। इस प्रवृत्ति और हौसले से नए प्रकाशक उभरे हैं। मुझे तो लगता है कि पिछली कई पीढ़ियां शायद अकेले में आहें भरती होंगी कि वे लोग इस बहार के समय युवा लेखक क्यों नहीं हैं, जब किताबों और लेखकों को इतना प्यार मिल रहा है।

दिव्य प्रकाश दुबे के साथ सत्य व्यास ही नहीं, मानव कौल, नीलोत्पल मृणाल तो हैं ही, नवीन चौधरी, इरा टाक, किशोर चौधरी, विमल चन्द्र पांडे, विजयश्री तनवीर, कर्नल गौतम राजऋषि, रेणु मिश्रा, उमा, पूजा उपाध्याय, तस्नीम खान, अविनाश मिश्र, मुज्तबा खान की एक पूरी पीढ़ी नए कथानकों, नई भाषा, नई संवेदना के साथ हिंदी फिक्शन का नया अध्याय लिख रही है। इस नए पाठकोन्मुख साहित्य में छोटे कस्बों से निकले मध्यम वर्ग के अंग्रेजी माध्यम के युवाओं को अपनी-सी लगनी वाली कहानियों के जरिये संबोधित किया गया तो हिंदी को नया पाठक वर्ग मिलना ही था।

उसी पाठक वर्ग की भावनात्मक ताकत का नतीजा है कि वे कहानियां बड़े फलक को छू रही हैं। इस नतीजे का खूबसूरत असर यह भी होना ही था कि सिनेमाई रूपांतरण के दरवाजे खुलें और देखते ही देखते यह होने लगा, हो रहा है। मेरी जानकारी में बहुत-सी हिंदी किताबों के राइट्स बिक चुके हैं, यानी वे प्रक्रिया में आगामी वर्षों में हमारे हाथों की उंगलियां कम पड़ जाएंगी, उंगलियों के पोरों पर गिनना पड़ेगा। वृहद हिंदी संसार की बहुरंगी कहानियों के आकाश के बादल छंटते दिख रहे हैं, नए आस्वादों, नई खुशबुओं, नए अहसासों, नई आवाजों के लिए तैयार रहिए।                                                                              ...लेखक साहित्यकार हैं

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