भारतीय सिनेमा का सफरनामा
संकलन-संपादन- जय सिंह
प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, मूल्य- 280 रुपए
अगर आप सिर्फ दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, मधुबाला, माधुरी दीक्षित और दीपिका पादुकोण को जानते हैं और खुद को सिनेमा का मुरीद भी कहते हैं, तो आप गलत साबित हो सकते हैं। अगर आपको लगता है कि फिल्म निर्माण की प्रक्रिया सिर्फ लाइट, कैमरा और एक्शन तक ही सीमित है तो आपको अपनी जानकारी और बढ़ाने की जरूरत है।
अगर आपने सिर्फ गुरुदत्त, श्याम बेनेगल, मणिरत्नम और यश चोपड़ा का नाम सुना है, तब तो जरूर आपको एक नजर फिर से भारतीय सिनेमा पर डालनी चाहिए। इस काम के लिए एक किताब से बेहतर शायद ही कुछ हो। एक ऐसी किताब जिसमें भारतीय सिनेमा के सफरनामे पर खुद उन लोगों ने कलम चलाई है, जिन्होंने सिनेमा को यह सफर तय करते देखा है और वे लोग भी, जो खुद इस सफर का एक जरूरी हिस्सा रहे हैं।
भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से आई यह किताब सिनेमा को जानने-समझने वाले लोगों के साथ-साथ उन लोगों के लिए भी पठनीय है, जिनके लिए सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम है। इस किताब में एक फिल्म के बनने से लेकर उसके बिकने तक पिछले सौ सालों में आए तमाम बदलावों को पढ़ा जा सकता है। फिर चाहे बात इतिहास बन चुके पोस्टरों की कहानी की हो या प्रचार के नए-नए तौर-तरीकों के 21वीं सदी के सिनेमा में एक जरूरी जगह पाने की। सौ अंक का हर तरह से अपना एक खास महत्व है।
सिनेमा से जुड़े इस महत्वपूर्ण अंक के साथ किताब के संकलन और संपादन से जुड़े जय सिंह ने पूरा न्याय करने की कोशिश की है। किसी भी पाठक के लिए जहां प्रसून जोशी, रेमो डिसूजा, कैलाश खेर, खैय्याम, दीप्ति नवल, तिग्मांशु धूलिया, रमेश सिप्पी, एन चंद्रा, गुलजार, महेश भट्ट की कलम से लिखे गए लेखों को पढ़ना दिलचस्प होगा। वहीं बॉलीवुड से लेकर मॉलीवुड, टॉलीवुड, लॉलीवुड, पॉलीवुड जैसी विभिन्न क्षेत्रीय फिल्म इंडस्ट्रीज का परिचय पाना भी एक नया अनुभव होगा। सिर्फ 200 पन्नों में सिनेमा के सौ साल के सफर को प्रस्तुत करना किसी भी तरह से आसान नहीं है। मगर योजनाबद्ध तरीके से किताब को निर्देशन, नृत्य-संगीत, तकनीक, क्षेत्रीय सिनेमा और विविध जैसी पांच श्रेणियों में बांटकर पाठक की सहूलियत का ध्यान रखा गया है।
विविधा में सिनेमा से जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर प्रदीप सरदाना, राजेश कुमार, मीनाक्षी शर्मा, अविनाश वाचस्पति, देव प्रकाश चौधरी और इकबाल रिजवी के लेख शामिल हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि किताब पढ़ने के बाद पाठक के जेहन में सिनेमा के नाम पर दिलीप कुमार, मधुबाला, रजनीकांत और कमल हसन के साथ-साथ विजय, मोहनलाल, एन.टी.रामाराव, माधबी मुखर्जी, साबित्री चटर्जी, शारदा जैसे नाम भी अपनी जगह बना लें। आखिर सपनों को सच और कल्पना को हकीकत में बदलने वाले सिनेमा की दुनिया इतनी भी छोटी नहीं है जितनी हमें परदे पर लगती है। इसका विस्तार परदे के उस पार भी है, जहां सिनेमा देखने जाना एक उत्सव के समान होता था। उस पार भी जहां हर नई फिल्म के रिलीज पर चर्चा करना दोस्तों की गपशप का एक जरूरी हिस्सा होता है। और उस पार भी जहां अपने फेवरेट हीरो की पिक्चर का पहला शो देखने के लिए लोग कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं।