उद्भ्रांत हिंदी के जाने-माने कवि हैं और समकालीन कविता में उनके योगदान की अनदेखी नहीं की जा सकती। कविता के प्रति चौतरफा उदासीनता के दौर में वह न सिर्फ निरंतर सक्रिय हैं, बल्कि महाकाव्य और खंडकाव्य के निरंतर सृजन में उनकी प्रतिबद्धता का भी पता चलता है।
'सृजन की भूमि' दरअसल उनके काव्यगत जीवन संघर्ष का दस्तावेज है, जिसे कोई चाहे, तो आत्मकथा भी कह सकता है, हालांकि यह उस रूप में नहीं है। इसमें कवि ने अपने काव्यगत संस्कारों के बारे में विस्तार से बताया है, तो अपनी कविताओं के बारे में दूसरों की टिप्पणियों की भी विशद चर्चा की है।
जबकि दूसरी किताब 'आलोचना का वाचिक' उनकी कविताओं पर आलोचकों के उद्गारों का रिकॉर्ड है, जो भारतीय प्रसारण सेवा में होने के कारण उनके लिए अपेक्षाकृत आसान था। हालांकि इससे इस किताब की उपयोगिता और महत्व थोड़ा भी कम नहीं होता। बल्कि अपने इस स्वरूप में वह अद्भुत है कि इसमें उद्भ्रांत की कविताओं पर परिचर्चाएं जैसे जीवंत हो उठती हैं।
सबसे बड़ी बात यह कि उद्भ्रांत की कविताओं पर दिग्गज आलोचकों के विचार सिलसिलेवार तरीके से दर्ज किए गए हैं। लेकिन इन दोनों किताबों के साथ दिक्कत यह है कि इनका स्वरूप भारी-भरकम है। अगर इनके संपादन में थोड़ी पेशेवर निर्ममता बरती जाती, तो पाठकों का कुछ उपकार होता।
'ब्लैकहोल' के इस नए संस्करण का महत्व यह है कि इसमें ज्ञानरंजन और अरुण पांडेय की बड़ी टिप्पणियों के अलावा अखबारों और पत्रिकाओं की समीक्षाएं भी हैं। ये तीनों किताबें कवि उद्भ्रांत की जीवंत छवि बनाती हैं।