हमारा बजाज! बुलंद भारत की बुलंद तसवीर...एक दौर में इस धुन को पूरा हिंदुस्तान गुनगुनाता था। करीब दो पीढ़ियों की जुबान पर चढ़ी रही थी बजाज स्कूटर के विज्ञापन की ये पंक्तियां। एक वक्त ऐसा भी था, जब बजाज चेतक की डिलीवरी के लिए लोगों को कई साल तक इंतजार करना पड़ता था। दरअसल, बजाज समूह को आज हम जिस रूप में देखते हैं, इसके पीछे संघर्ष की एक अनूठी दास्तान है। स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी और महात्मा गांधी के विश्वासपात्र जमनालाल बजाज ने सन् 1926 में बजाज समूह की शुरुआत की। उनके बड़े बेटे कमलनयन बजाज ने पिता से मिली मूल्यों की पूंजी और जीतने की जिद से इसे एक वटवृक्ष में तब्दील कर दिया।
कमलनयन बजाज की जन्मशती के मौके पर उनके संघर्ष की गाथा को एक किताब की शक्ल में पेश किया गया है। हालांकि बिजनेस हिस्ट्री लिखना कोई हंसी-खेल नहीं है। कारोबार के विभिन्न पहलुओं और उससे जुडे़ दृष्टिकोण की गहन पड़ताल करनी पड़ती है। ‘कमलनयन बजाज : आर्किटेक्ट ऑफ द बजाज ग्रुप’ पुस्तक की लेखिका गीता पीरामल ने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है।
इस किताब के जरिये कमलनयन बजाज की शख्सियत के कई आयाम देखने को मिलते हैं। वह न केवल उद्योग जगत के नेता थे, बल्कि एक राष्ट्रीय नेता भी थे। कारोबार, समाजसेवा और राजनीति समेत हर क्षेत्र में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। 23 जनवरी, 1915 को जन्मे कमलनयन बजाज का आरंभिक जीवन गांधीजी के आश्रम में चरखा चलाने, खाना पकाने और चक्की पीसने जैसे कामों में बीता। गांधीजी के साथ नमक सत्याग्रह में भी वह शामिल हुए और 1932 में छह महीने तक सजा काटी। उनकी शिक्षा पहले पुणे में हुई। फिर अर्थशास्त्र पढ़ने के लिए वह कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गए। मगर, द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के कारण उन्हें बीच में ही भारत लौटना पड़ा। 1942 में जमनालाल बजाज का देहांत होने से पारिवारिक व्यवसाय का सारा भार कमलनयन बजाज के ऊपर आ गया। उन्होंने इस व्यवसाय को बखूबी बढ़ाया। बजाज ऑटो, बजाज टैम्पो, बजाज इलेक्ट्रॉनिक्स, मुकन्द आयरन एंड स्टील तथा अन्य कई कंपनियां उनकी व्यवसायिक दूरदर्शिता का प्रमाण हैं।
हालांकि, उन्होंने व्यवसाय में कदम रखा, तो कई चुनौतियां उनके सामने थीं। पूरे देश में उथल-पुथल मची हुई थी। विभाजन, युद्ध, दंगे, खाद्यान्न संकट, ऊर्जा की कमी, कच्चे माल का संकट, तकनीक और विदेशी विनिमय कम होने से अर्थव्यवस्था बदहाल थी। बैंकिंग सिस्टम में भारी बदलाव हो रहे थे। लाइसेंस राज समेत देश के उद्यमियों के सामने कई चुनौतियां थीं। ऐसे हालात में किसी व्यवसाय के लिए उभरना आसान नहीं था। लेकिन कमलनयन बजाज ने डटकर हर चुनौती का सामना किया। जब उन्होंने व्यवसाय में कदम रखा, तो बजाज ग्रुप की बिक्री करीब एक करोड़ रुपये सालाना थी। 200 कर्मचारियों के साथ कुछेक जिनिंग और प्रेसिंग मिल्स के साथ कर्ज भी उन्हें विरासत में मिला था। विभाजन के वक्त बजाज ग्रुप को अपनी एक तिहाई संपत्ति गंवाने से भी गहरा धक्का लगा।
कमलनयन बजाज ने सबसे पहले कर्ज चुकता करके एक नई शुरुआत की। उन्होंने अगले तीन दशक में न केवल 16 नई फैक्ट्रियां शुरू कीं, बल्कि 5 फैक्ट्रियों का अधिग्रहण भी कर लिया। 1965 तक बजाज देश का 19वां सबसे बड़ा बिजनेस हाउस बन गया था। इसकी गिनती दुनिया के नामचीन दुपहिया एवं ऑटो उत्पादकों में होने लगी। 1 मई 1972 को कमलनयन बजाज के निधन के वक्त कंपनी की बिक्री 76.24 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी थी। आज बजाज समूह की दर्जनों कंपनियां विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रही हैं।
कारोबार के साथ-साथ समाजसेवा और राजनीति में भी कमलनयन बजाज समान रूप से सक्रिय थे और अपनी आमदनी का ज्यादातर हिस्सा वह सामाजिक कार्यों में खर्च कर देते थे। उन्होंने सार्वजनिक कार्यों के प्रोत्साहन हेतु जमनालाल बजाज सेवा ट्रस्ट की स्थापना की। गांधी एवं विनोबा से वह खासे प्रभावित थे। खादी में विश्वास रखने के कारण उन्होंने कोई कपड़ा मिल स्थापित नहीं की। गलत ढंग से मुनाफा कमाने के वह कभी पक्षधर नहीं थे। यही कारण था कि बजाज शुगर मिल्स में शराब बनाने की इजाजत उन्होंने कभी नहीं दी। 1957 से 1971 तक तीन बार वह महाराष्ट्र के वर्धा से लोकसभा सदस्य चुने गए। समाज-सेवा, सादगी और नैतिकता जैसे गुण उन्हें पिता जमनालाल बजाज से विरासत में मिले थे।
लेखिका गीता पीरामल ने कमलनयन बजाज की जिंदगी को संजीदगी से शब्दों में पिरोया है। गीता पीरामल ऑक्सफोर्ड की शोधार्थी हैं और उन्हें कारोबारी दुनिया के इतिहासकार के तौर पर जाना जाता है। ‘कमलनयन बजाज चेरीटेबल ट्रस्ट’ द्वारा प्रकाशित इस किताब को लिखने के लिए धूल की परतों में दबे 1938 से 1972 के दौर के दस्तावेजों को उन्हें खंगालना पड़ा। यही वह दौर था जब कमलनयन बजाज के हाथ में समूह की बागडोर थी। उनके बेटे राहुल बजाज समेत पूरे बजाज परिवार ने जिस पारदर्शिता से तथ्य उपलब्ध कराने में लेखिका का सहयोग किया, वह भी काबिलेतारीफ है।