क्या भारतीय लोकतंत्र एक फिल्मी कहानी बनता जा रहा है? जिस तरह से फिल्मी कलाकारों को राजनीति में उतारा जा रहा है, उससे अपने लोकतंत्र का कितना भला हो रहा है? असल में हल्की राजनीति में हम भीड़ और वोट जुटाने के लिए जहां बाहुबल को कोसते हैं, तो सितारों की भागीदारी को भी उसी दर्जे में रखा जा सकता है।
नावों का अब एक मंत्र समझ में आता है कि साम, दाम, दंड, भेद सब लगा दो, पर जीतना है। राजनीतिक दल इन समीकरणों पर सभी तरह के मुद्दों व लज्जा से दूर चुनावी खेल में लिपटे रहते हैं। हर तरह के चर्चित व्यक्ति का राजनीित में सम्मान है। गुंडे, मवाली, अपराधियों की गहरी पैठ राजनीति में तो हमेशा से रही है, पर एक खास वर्ग अब राजनीति में आने को उतारू है और इनमें फिल्मी हस्तियों की कतार लंबी होती जा रही है। फिल्मी कलाकारों का राजनीति में प्रवेश हमारे देश में वैसे दक्षिण भारत की ही देन है। यहां एन. टी. रामाराव, जयललिता जैसी फिल्मी हस्तियां राजनीति में तगडे़ प्रयोग स्थापित कर चुकी हैं। आज दक्षिण भारत में सर्वाधिक फिल्मी हस्तियां राजनीति में जोर आजमाइश में जुटी हैं। अगर राजनीति में न भी हों, तो दलों की पैरवी करने में तो आगे हैं ही।
राजनीति में फिल्मी कलाकारों का अब पूरा जोर चल रहा है। हॉलीवुड, बॉलीवुड, टॉलीवुड हर जगह से फिल्मी सितारे राजनीति में पैठ बनाने के चक्कर में हैं। सच तो यह है कि राजनीति में भागीदारी करना इनके लिए रोमांच या बतौर पेंशन जैसा है। अगर कुुछेक गंभीर किस्म के फिल्मी कलाकारों को छोड़ भी दें, तो बाकी सारे राजनीति में रोमांस करने निकले हैं।
राज्यसभा में इनका प्रतिनिधित्व अक्सर दिखाई देने लगा है। जयाप्रदा, रेखा, हेमामालिनी जैसी अभिनेत्रियों का पिछला और आज का राजनीतिक चिट्ठा पढ़ लिया जाए, तो घोर निराशा हाथ लगेगी। हेमामालिनी को ही लीजिए, फिल्मों में एक जोरदार जगह बनाने के या विज्ञापनों में किसी उत्पाद की प्रशंसा करने के सिवाय इन्हें किसी मुद्दे पर बातचीत करते हुए नहीं देखा गया। फिल्मी कलाकार होने के कारण आम आदमी के साथ सीधा संपर्क और संवाद इनके लिए मुसीबत खड़ी कर देता है। इसी चुनाव में एक श्रद्धालु ने इनके चरणों को स्पर्श करने की कोशिश की, तो बवाल खड़ा हो गया। मेरठ से कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करने वाली नगमा को भी अपने ही किसी वोटर को झापड़ रसीद करना पड़ा। महिला सितारों की छेड़छाड़ की कहानी को देखकर इनकी पार्टियों ने चुनाव आयोग से इनकी सुरक्षा की गुहार लगाई है।
अगर हालात ऐसे हैं, तो प्रश्न यह उठता है कि किस तरह ये फिल्मी कलाकार हमारे मुद्दों और हमारा प्रतिनिधित्व कर पाएंगे। इनकी सामाजिक, आर्थिक सोच कितनी गंभीर हो सकती है, इस बात का तो अंदाजा लगाया ही जा सकता है।
चुनाव में उतरने के उल्लास में कलाकार पार्टी विशेष के प्रचार-प्रसार में भी जुटे रहते हैं। यह सब प्रायोजित कार्यक्रम भी हो सकता है। पार्टियों के लिए भीड़ जुटाने की तगड़ी पहल तो इनकी कृपा से हो ही जाती है। इसी कड़ी में राखी सावंत ने भी टोपी पहनकर पार्टी ही बना ली है, जो शायद और सितारों की तुलना में एक कदम आगे का काम है।
देश की सारी पार्टियां आजकल फिल्मों का सहारा लेने के लिए भरसक प्रयत्नों में रहती हैं। और तो छोड़िए, पर आम आदमी पार्टी, जिसने एक बार सारे देश का ध्यान एक विकल्प के रूप में खींचा था, अब यह भी रूटीन हरकतों पर उतर आई है। चंडीगढ़ से गुल पनाग व लखनऊ से जावेद जाफरी सरीखे कलाकारों को उतारने की कसरत इन्होंने भी की ही है। अब यह तो लोकतंत्र में स्वीकार योग्य है कि कोई भी, कहीं भी बिना अर्हताओं के चुनाव लड़ सकता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि गत दशकों में इन फिल्मी सितारों ने कौन से बड़े मुद्दों को खड़ा किया, जो जनहित में थे। यह तो तय है कि इससे निराशा ही हाथ लगेगी। असल में हल्की राजनीति में हम भीड़ और वोट जुटाने के लिए जहां बाहुबल को कोसते हैं, तो ग्लैमर का प्रयोग भी उसी दर्जे में रखा जा सकता है।
यह हमारा ही देश नहीं है, जहां हीरो-हीरोइनों को राजनीति में घुसपैठ करते देखा जा सकता है। यह सारी दुनिया की कहानी है। अन्य देश जैसे अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में भी पर्दे के हीरो जमीन पर उतरते हैं, पर एक बड़ा अंतर तब भी रहता है। उनमें राजनीति में उतरने के पीछे जमीर भी होता है। वहां हमारी देश की राजनीति जैसे हालात नहीं हैं। वहां राजनीति में प्रवेश के पीछे बड़ी सेवा भावना भी होती है।
असल में हमारे देश में राजनीति पावर का खेल है। फिल्मों में कमजोर पड़ता किरदार या फिर सेवानिवृत्ति जैसे हालात सितारों को भी हताशा देते हैं और फिर एक बार चमकने के लिए वे राजनीति का सहारा लेते हैं। राज्यसभा व संसद में इनकी आज उपस्थिति इसी बात का संकेत है।
राजीव गांधी ने एक बार अमिताभ बच्चन को राजनीति में उतारकर उस समय बड़ा कमाल किया और बच्चन ने बड़ी जीत हासिल कर कांग्रेस का हौसला बढ़ाया था। सुनील दत्त ने जरा गंभीरता दिखाते हुए कुछ अच्छे काम भी किए।
फिल्मी हस्तियों का राजनीति में प्रवेश किस हद तक ठीक है, यह एक बड़ी बहस का मुद्दा है, क्योंकि इनकी भागीदारी भीड़ व वोट दोनों जुटा तो लेती है, पर इनका योगदान अपने लिए ही ज्यादा है।
अगर राजनीति में सुधार लाना है, तो इनकी भूमिका के बारे में भी गंभीरता से सोचना पड़ेगा, क्योंकि पर्दे व वास्तविकता में जमीन-आसमान का अंतर है। हां, पर्दे को जमीन पर उतारने की इनकी कमर कसाई के बारे में तो सोचा जा सकता है। पर जमीन पर भी पर्दे वाले हालात पैदा करने वाली इनकी और इनके दलों की कोशिशें एक दिन देश को फिल्मी स्टाइल की ओर धकेल देंगी, जो आज भी कुछ हद तक दिखाई देती हैं।