इस बात के कयास जारी हैं कि क्या भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने हाल ही में पश्चिम बंगाल के बर्दवान में उजागर हुई कथित आतंकी कार्रवाई में शारदा चिटफंड घोटाले का पैसा लगने संबंधी आरोप लगाने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से विचार विमर्श किया था। उल्लेखनीय है कि शारदा घोटाले में तृणमूल कांग्रेस के कई नेता फंसे हुए हैं। ऐसा माना जा सकता है कि सामान्य परिस्थितियों में अमित शाह, जिन्हें मोदी का अंतरंग मित्र माना जाता है, बिना भाजपा आलाकमान की सलाह के ऐसा गंभीर आरोप नहीं लगाएंगे। हालांकि सार्वजनिक तौर पर प्रधानमंत्री मोदी ने ममता बनर्जी की पार्टी पर लगाए गए अमित शाह के आरोप से खुद को अलग कर लिया है, लेकिन लगता है कि इससे जो नुकसान होना था, वह हो चुका है।
ममता बनर्जी के खिलाफ भाजपा की अनावश्यक आक्रामकता के चलते पिछले कुछ दिनों से संसद का कामकाज व्यापक रूप से बाधित हो रहा है, खासकर ऐसे समय में जब सत्तारूढ़ पार्टी ठोस विधायी एजेंडा संसद के समक्ष लाने की योजना बना रही थी। भाजपा के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस की जवाबी आक्रामकता ने भी, चाहे वह काले धन के मुद्दे पर हो या साध्वी निरंजन ज्योति के सांप्रदायिक बयान पर, कुछ हद तक बाकी विपक्ष को जोड़ने का काम किया है। इसके चलते संसद के दोनों सदनों, लोकसभा और राज्यसभा में (जहां विपक्ष बहुमत में है), भाजपा के खिलाफ साझा मंच बनाने की कवायद तेज हुई है।
दुर्भाग्य से भाजपा के खिलाफ विपक्ष की सख्त एकजुटता न केवल राजग सरकार के कार्यकाल की शुरुआत में दिख रही है, बल्कि उन विधायी सुधारों को भी खतरे में डाल रही है, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमल में लाना चाहते हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? मेरी नजर में ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि महाराष्ट्र एवं हरियाणा के विधानसभा चुनावों में जीत के बाद भाजपा पहले से कहीं ज्यादा अहंकारी हो गई है। वास्तव में पश्चिम बंगाल की जनसभा में अमित शाह का आक्रामक तेवर वैसा ही था, जैसा लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी का था। बंगाल में शाह के भाषण के स्वर, तेवर और ताल से ऐसा लग रहा था, मानो भाजपा अपने चुनावी बुलडोजर के साथ राज्य के बाकी अन्य दलों को नेस्तनाबूद करने आ रही है।
बेशक शाह को अपनी पार्टी के लिए जो बेहतर लगे, वैसा करने का हक है, लेकिन मोदी को प्रधानमंत्री का पदभार संभालते हुए ली गई अपनी उस प्रतिज्ञा को भी याद रखनी चाहिए कि वह एक नए सहयोगी विकास मॉडल के लिए सभी मुख्यमंत्रियों के साथ रचनात्मक ढंग से काम करेंगे। क्या मोदी इस प्रतिज्ञा का पालन कर रहे हैं, उत्तर है नहीं।
अमित शाह क्षेत्रीय नेताओं के खिलाफ जितना ज्यादा आरोप लगाएंगे, विपक्ष संसद में मोदी के सुधार एजेंडे को विफल बनाने के लिए उतना ही ज्यादा प्रेरित होगा। इसके अलावा, मोदी विपक्ष को गाहे-बगाहे ठंडे बस्ते में पड़े कई मुद्दों को उठाने का मौका दे रहे हैं। मसलन, ममता बनर्जी जैसे क्षेत्रीय नेताओं के खिलाफ आपराधिक किस्म का आरोप लगाने के लिए अमित शाह सही व्यक्ति नहीं हैं। क्योंकि शाह खुद गंभीर आपराधिक मामले में जांच के घेरे में हैं और गुजरात में सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में उनके खिलाफ आरोपपत्र दायर हो चुका है। इस मामले को सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई देख रही है, जिसने स्पष्ट कारणों से इस मामले की सुनवाई गुजरात से बाहर करने की मांग की थी। इस वर्ष की शुरुआत में शाह मुश्किल से इशरत जहां मुठभेड़ मामले में आरोपपत्र से बचे थे।
भाजपा, जिसके अध्यक्ष खुद अमित शाह हैं और जो अक्सर खुद को 'पार्टी विद डिफरेंस' कहती है, के लिए सबसे अच्छी सलाह यही है कि शाह दूसरों के खिलाफ आपराधिक आरोप न लगाएं। कम से कम, फायरब्रांड नेता ममता बनर्जी के खिलाफ तो नहीं। टीवी पर चर्चा के दौरान एक टिप्पणीकार ने कहा कि ममता बनर्जी को ओडिशा के नवीन पटनायक की तरह राजनीतिक गरिमा दिखानी चाहिए, जिनकी पार्टी के खिलाफ भी चिटफंड घोटाले की जांच चल रही है। खैर, ममता बनर्जी नवीन पटनायक नहीं हैं और यही भारतीय राजनीति की खूबी है कि यहां विभिन्न स्वभाव के नेता हैं। इसके अलावा, इससे यह भी नहीं मान लेना चाहिए कि सीबीआई जिस तरह से पटनायक की पार्टी के नेताओं को गिरफ्तार कर रही है और पूछताछ कर रही है, उससे वह खुश हैं। पटनायक आम तौर पर मितभाषी हैं और सही मौके पर अलग ढंग से अपनी बात रखते हैं।
नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए सबसे बड़ा संदेश यही है कि वे भी उसी राजनीतिक व्यवस्था की उपज हैं, जो काले धन द्वारा संचालित चुनावी राजनीति पर फलती-फूलती है। यदि भाजपा नेतृत्व पाखंडपूर्ण काम करेगा और क्षेत्रीय दलों के खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसी का इस्तेमाल करेगा और फिर अधूरे सुबूतों के आधार पर राजनीतिक आरोप लगाएगा, तो यह एक सीमा से आगे उसके हित में नहीं होगा। अमित शाह ने बर्दवान आतंकी मामले को शारदा चिटफंड घोटाले से जोड़कर जो आरोप लगाया है, यह बिल्कुल वही है।
हालांकि पीएमओ ने सदन में विशेष रूप से शाह के बयान को खारिज किया है, लेकिन दुर्भाग्य से कुछ भाजपा प्रवक्ता अब भी यही इशारा कर रहे हैं, 'फिलहाल तो इसका कोई ठोस सुबूत नहीं है, लेकिन जल्द ही यह सामने आएगा।' सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्यों का ऐसा बयान दर्शाता है कि चुनावी जीत के चलते भाजपा का अहंकार बढ़ रहा है, जो उसके कार्यकर्ताओं के हाव-भाव से जाहिर होता है। मोदी अगर अपने विकासात्मक सुधार के एजेंडे पर विपक्षी दलों का सहयोग चाहते हैं, तो उन्हें तुरंत इस पर नाराजगी जतानी चाहिए। हालांकि पार्टी कार्यकर्ताओं तक ऐसा संदेश पहुंचाना मोदी के लिए कठिन है, क्योंकि उन्होंने अब तक उन्हीं लोगों को पुरस्कृत किया है, जिन्होंने राजनीतिक आक्रामकता और सांप्रदायिक विभाजनकारी चर्चाओं को बढ़ावा दिया है।