वह आते ही मेरे आगे फटी एड़ियां रगड़ते अपना हाथ मेरे हाथ में देने की कोशिश करते हुए बोले, मेरा हाथ देख दो प्लीज! तुम्हारे हाथों उनका हाथ देखने की खबर अखबार में पढ़ी, तो पता चला कि...
तो मैंने उसके हाथ को बड़ी मुस्तैदी से बेहाथ करते कहा, क्या देखना तुम्हारा हाथ? तुम्हारे हाथ में झाड़ू-पोंछे की लाइनों के सिवा और है ही क्या! तुम्हारी किस्मत में जीते-जी तो जीते-जी, मरने के बाद भी घर के कोने-कोने में झाड़ू-पोंछा करना ही लिखा है मेरे दोस्त! मैंने उसका हाथ बिना देखे ही दुखी मन से कहा, तो वह गुस्साते हुए बोले, हद है यार! मैं तो तुम्हारे पास अपना हाथ दिखाने इसलिए आया था कि तुमने उनका हाथ देखकर कहा है कि वह एक दिन देश की राष्ट्रपति बनेंगी। बस, इसीलिए घर के जोगी-जोगडे़ के पास दुस्साहस कर चला आया और एक तुम हो कि...भगवान करे, अगले जन्म में तुम किसी का हाथ तो क्या, मुंह देखने लायक तक न रहो।
उसने मुझे श्राप दिया, तो मैं भीतर तक कांप गया। जानता हूं, लोकतंत्र में कुछ फलीभूत हो या न हो, पर जनता का अभिशाप अवश्य फलीभूत होता है। सो उसे मनाते हुए मैंने कहा, देखो यार! रही बात तुम्हारा हाथ देखने की, तो तुमसे भला क्या छिपाना! सच तो यह है कि जनता के हाथ में रेखाएं होती ही नहीं! दूसरे, मैं ठहरा राज ज्योतिषी!
तो इस देश में जनता का हाल तो छोड़िए, हाथ तक देखने वाला कोई नहीं है?
नहीं, वह बात नहीं। जिसे कोई नहीं देखता, उसे ऊपर वाला देखता है।
पर जनता का हाथ क्या हाथ नहीं है?
है तो यार! उसका हाथ तो सबसे मजबूत होता है, पर जनता के हाथ में होता ही क्या है? दस रुपये भी तो जेब से जनता ऐसे निकालती है, जैसे उसकी जान निकल रही हो। तो फिर क्यों देखूं जनता का हाथ? तुम लोगों के हाथ देखने वाले सड़क के मोड़-मोड़ पर बथेरे बैठे हैं यार! ये लो सौ रुपये और उनको अपना हाथ दिखाकर करो अपना भविष्य सुखद।