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भाजपा ने रास्ता पकड़ लिया है!

Mon, 10 Jun 2013 09:07 PM IST
कुमार प्रशांत
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भारतीय जनता पार्टी में वह हो गया, जो होना था। जो यह नहीं चाहते थे, वह भी इसे रोक नहीं सके। पार्टी का हर वह चेहरा, जिसे देश अब तक भाजपा का चेहरा मानता था, अपना चेहरा छिपा रहा है या बदल रहा है।
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पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने यह कहकर हवा पर अपना अख्तियार जताने की कोशिश की कि यह फैसला उनका है, जो पार्टी को नहीं, देशहित को ध्यान में रखकर लिया गया है।

उनके ध्यान में किसका हित था यह तो वही जानें, लेकिन उनके ध्यान में यह बात तो नहीं थी कि वह जो कह रहे हैं, उसका एक मतलब यह भी निकलता है कि कम से कम भाजपा में देशहित और पार्टी हित अलग-अलग हैं। अगर दोनों एक होते, तो यह कहने की जरूरत ही नहीं होती।
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फिर उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में जो सबसे लोकप्रिय होता है, वही नेता होता है। यहां भी वह चूक गए। लोकतंत्र और भीड़तंत्र में गहरा फर्क होता है और परिपक्व नेता उसे कहते हैं, जो इसकी पहचान कर फैसला लेता है। हो सकता है कि नरेंद्र मोदी भाजपा के तारक साबित हों, पर आज वह भाजपा की भीड़ के नुमाइंदे हैं, उसके नेतृत्व की पसंद नहीं।

गुजरात में तीसरी जीत के बाद से ही मोदी ने दिल्ली को बता दिया था कि कभी पार्टी कार्यालय के जिस एक कमरे में वह रहे थे, अब वह पूरा मकान उन्हें चाहिए।

वह उस तरफ दौड़ पड़े, पार्टी पीछे-पीछे हांफती खिंचती रही। गोवा तक पहुंच कर उन्होंने तय पाया कि अब घी सीधी उंगली से नहीं निकलेगा, इसलिए उन्होंने अपने नाम के मंत्रोच्चार पर रोक भी नहीं लगवाई। अब अगर किसी को नरेंद्र मोदी को रोकना था, तो उसे बीमार नहीं पड़ना था, बल्कि भीड़ का सामना करने आगे आना था। भाजपा में इसकी परंपरा रही ही नहीं है।

वहां की राजनीति बुजुर्गों के आशीर्वाद से चलती है या फिर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आदेश से। लालकृष्ण आडवाणी की उम्र उन्हें कुछ भी ऐसा करने से रोकती है, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और वेंकैया नायडु आदि ने कभी सीधा संघर्ष किया ही नहीं, तो अब कैसे करते। कुछ दूसरे भी थे, जो गोवा नहीं गए, लेकिन यह भी तो देखें कि वे कहीं नहीं गए और कहीं के नहीं रहे।

अब नरेंद्र मोदी ही भाजपा की सच्चाई हैं। वह प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं, कहना कठिन है, क्योंकि किसी के कहने से कोई प्रधानमंत्री नहीं बनता, उसे बहुमत पाना होता है। अभी हम यह देखें कि मोदी के आने से भाजपा में क्या-क्या फर्क पड़ेगा।

सबसे पहला फर्क पड़ेगा कार्यकर्ताओं के उत्साह में। मोदी की जीत उनकी अपनी जीत है, ऐसा उत्साह उनमें जागेगा और ऐसे उत्साह के बल पर अपनी राजनीति चलाने में मोदी को महारत हासिल है। इसलिए जमीनी स्तर पर भाजपा की सक्रियता बढ़ेगी।

लेकिन भाजपा जिस सबसे बड़े संकट से दो-चार होगी, वह है दिशा का संकट। मोदी के पास यह नहीं है, तो वह कार्यकर्ताओं को कैसे दे सकेंगे? दूसरा फर्क होगा कि एनडीए का आधार सिकुड़ेगा। नीतीश कुमार को फैसला लेना होगा और दूसरे सहयोगियों को भी।

इन सबको आडवाणी-अटल शैली के गठबंधन की आदत है। मोदी की शैली समर्पण मांगती है। सांप्रदायिकता की राजनीति को आप एक बार पचा भी लें, जैसा कि पचाते आए हैं, लेकिन आत्मसम्मानविहीन गठबंधन कठिन जाएगा। सवाल संघ परिवार के सभी घटकों के सामने खड़ा होने वाला है।

आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल आदि किसी के साथ गुजरात में मोदी ने सीधा रिश्ता नहीं रखा, क्योंकि वह रिश्ते में समर्पण चाहते हैं और सारे रिश्तों के इस्तेमाल की मनमानी चाहते हैं।

तीसरा फर्क भाजपा की राष्ट्रीय उपस्थिति पर पड़ेगा। गुजरात के समाज का मानसिक सांप्रदायिक दलन करने के बाद सरकार चलाना एक बात है और राष्ट्रीय स्तर पर, विभिन्न स्थितियों-व्यक्तियों-दलों के साथ तालमेल करके आगे बढ़ना दूसरी बात।

वह विसंगतियों का संतुलन नहीं बना पाते हैं। यही वह करतब था, जिसे करते-करते अटल-आडवाणी-जार्ज की त्रिमूर्ति का दम निकल जाता था, लेकिन एनडीए का सबसे व्यापक आधार भी तभी बना था।

बहरहाल, सबको दरकिनार कर मोदी के साथ भाजपा चल तो पड़ी है, लेकिन वह कहां जा रही है और क्यों, यह कोई नहीं जानता! मोदी जानते हों और सबको जना भी सकें, तो पार्टी की खैर है, वरना भाजपा में यह बिखराब का प्रारंभ है।
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