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दक्षिण भारत की सियासत: भाजपा का दबदबा बढ़ा तो खिड़की खुली, दरवाजा बाकी

महेंद्र बाबू कुरुवा
Updated Sat, 08 Jun 2024 06:58 AM IST

सार

भारतीय जनता पार्टी ने दक्षिण की 130 सीटों में से 29 सीटों पर जीत दर्ज की। इस चुनाव ने साबित कर दिया कि दक्षिण में भाजपा का दबदबा बढ़ रहा है और आने वाले समय में दक्षिण भारतीय राजनीतिक समीकरण भाजपा की राजनीति के साथ एक बड़े बदलाव के लिए तैयार हैं।
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भाजपा का दक्षिण में ऐसा रहा प्रदर्शन - फोटो : अमर उजाला


लंबे समय से दक्षिणी राज्यों में भाजपा को 'उत्तर भारतीय पार्टी' माना जाता रहा है। तमाम प्रयासों के बावजूद कर्नाटक को छोड़कर यह दक्षिणी राज्यों में अपनी पैठ नहीं बना पाई। हालांकि 2019 में मोदी लहर में भी आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु में एक भी सीट नहीं जीत पाने के बाद भाजपा दक्षिण के प्रति गंभीर हो गई। इन तीनों राज्यों में भाजपा की हार के पीछे कई कारण थे। आंध्र में भाजपा के खिलाफ लोगों में काफी नाराजगी थी, क्योंकि उसने राज्य को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया और जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व में वाईएसआर कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश में किसी अन्य पार्टी के लिए राज्य के चुनावी मैदान में उतरने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी थी। तमिलनाडु में पारंपरिक रूप से द्रविड़ पार्टियों की राजनीति हावी रही है। यहां तक कि केरल में भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति भी उल्टी पड़ गई और भाजपा द्वारा उठाए गए सबरीमाला मुद्दे का ज्यादातर लाभ केरल कांग्रेस को मिला।


मगर 2024 के आम चुनाव में चीजें बदल गईं। दक्षिण भारत की 130 सीटों में से भाजपा ने 29 सीटें हासिल कीं, जिनमें से तीन आंध्र प्रदेश में, 17 कर्नाटक में, आठ तेलंगाना में और एक सीट केरल में है। आंध्र प्रदेश में पार्टी का वोट शेयर 2019 के 0.98 फीसदी से बढ़कर अब 11.28 फीसदी हो गया है। यह पूर्व राजग सहयोगी एवं तेदेपा प्रमुख चंद्रबाबू नायडू के साथ समझौते के कारण हुआ, जो अब केंद्र में 'किंग मेकर' बन गए हैं। आंध्र में भाजपा की वापसी का कारण उसके दूसरे सहयोगी और जनसेना पार्टी के फिल्म स्टार पवन कल्याण द्वारा हासिल भारी युवा वोट भी हैं। आंध्र प्रदेश से सटे तेलंगाना में हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में भाजपा की स्थिति खराब हो गई थी, लेकिन आम चुनाव में यह पूरी ताकत के साथ उभर कर सामने आई है। भाजपा ने तेलंगाना की छह में से तीन सीटें हासिल कीं, इसने बीआरएस को तीसरे स्थान पर धकेल दिया। बूथ स्तर पर अपना स्वयं का पार्टी कैडर तैयार करने के लगातार प्रयासों का नतीजा है कि भाजपा का वोट शेयर 2019 के 19.65 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 35.08 प्रतिशत हो गया। इसके अलावा, राज्य की कांग्रेस सरकार द्वारा तेलंगाना के किसानों से कर्ज माफी का वादा पूरा नहीं करने का लाभ भी भाजपा को मिला।


'देवताओं का अपना देश' कहे जाने वाले केरल में खाता खोलने का भाजपा का लंबे समय का सपना पूरा हो गया, क्योंकि पार्टी के प्रत्याशी ने त्रिशूर निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की। पार्टी ने कट्टर हिंदुत्व के अपने एजेंडे से विकास की तरफ अपना रुख मोड़ दिया, जिससे उसका वोट शेयर 2019 के 13 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 16.68 प्रतिशत हो गया। भाजपा को तमिलनाडु से काफी उम्मीदें थीं, क्योंकि उसके युवा राज्य प्रमुख अन्नामलाई पू्र्व आईपीएस हैं और पार्टी ने उन्हें खुली छूट दे रखी है। लेकिन कद्दावर नेताओं के बार-बार दौरे, भाजपा की केंद्रीय इकाई द्वारा तमिल संस्कृति एवं परंपरा पर जोर दिए जाने तथा 'कच्चातिवु' मुद्दे को उठाने के बावजूद पार्टी वहां सीट नहीं जीत सकी। हालांकि 2019 के 3.66 फीसदी के मुकाबले उसका वोट शेयर बढ़कर 2024 में 11.24 फीसदी जरूर हो गया, जो कि तीन गुना ज्यादा है। भाजपा द्वारा हासिल यह वोट शेयर 1999 से भी ज्यादा है, जब वह राज्य में अपने चरम पर थी और उसने तीन सीटें जीती थीं। यह दर्शाता है कि भाजपा ने द्रविड़ पार्टियों के वोट शेयर में सेंध लगा दी है, खासकर अन्नाद्रमुक के वोट शेयर में, जो पार्टी सुप्रीमो जयललिता के निधन के बाद बदहाल है। हालांकि द्रमुक के वोट शेयर में सेंध लगाना मुश्किल है, जिसने राज्य की 39 में से 22 सीटों पर जीत दर्ज की है।


कर्नाटक का परिणाम अजीबोगरीब रहा, जहां भाजपा का वोट शेयर 2019 के 51.38 से घटकर इस बार 46.06 फीसदी रह गया है। जद (एस) के साथ गठजोड़ करना भी भाजपा को भारी पड़ गया, जद (एस) प्रज्वल रेवन्ना से संबंधित विवादों के कारण राज्य के वोट पैटर्न में जबर्दस्त बदलाव दिखा। वर्ष 1996 के बाद यह पहली बार था, जब राज्य के दोनों प्रमुख समुदाय-वोकालिंगा एवं लिंगायत भाजपा के साथ थे। इस तरह, भले ही भाजपा ने सीटें हारी हों, लेकिन उसे कुछ अप्रत्याशित समुदायों का वोट मिला है।


दक्षिण में भाजपा के समग्र प्रदर्शन से कोई भी राष्ट्रीय पार्टी चार सबक सीख सकती है। पहला, दक्षिण भारत कोई एक इकाई नहीं है, जैसा कि कई उत्तर भारतीय मानते हैं। हर राज्य के अपने सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक कारक होते हैं, जो मतदान को प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि दक्षिण के प्रत्येक राज्य में भाजपा ने वोट शेयर और जीती गई सीटों के मामले में विरोधाभासी प्रदर्शन किया है। दूसरा, कोई भी राष्ट्रीय पार्टी दक्षिण की क्षेत्रीय पार्टियों की अनदेखी नहीं कर सकती। तेदेपा एवं जद (एस) ने इसे एक बार फिर साबित किया है। तीसरा सबक यह है कि विचारधारा और राजनीतिक बयानबाजी से वोट तो मिल सकते हैं, लेकिन सिर्फ यह वोटों के सीटों में तब्दील होने की गारंटी नहीं है। केरल और तमिलनाडु ने भाजपा के लिए इसे साबित किया है। अंतिम सबक यह है कि दक्षिण की राजनीति में अब फिल्म स्टार उतने प्रासंगिक नहीं रहे। आंध्र प्रदेश और केरल में फिल्म स्टार के साथ भाजपा के जुड़ाव और उससे मिले चुनावी लाभ से यह साफ है। कुल मिलाकर, इस चुनाव ने साबित कर दिया कि दक्षिण में भाजपा का दबदबा बढ़ रहा है और आने वाले समय में दक्षिण भारतीय राजनीतिक समीकरण भाजपा की राजनीति के साथ एक बड़े बदलाव के लिए तैयार हैं।

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