मौत, भूख और बीमारी वैसे लोगों का पीछा कर रही है, जो ऐसे मुश्किल वक्त में बच गए हैं, जब कब्रिस्तान तक पानी में डूबे हुए हैं और सड़ती हुई लाशों को दफनाने के लिए कहीं सूखी जमीन नहीं बची है। मैं यह उम्मीद कर रही थी, जैसी कि हमारी एशियाई परंपरा है, भारतीय प्रधानमंत्री मोदी अपने पाकिस्तानी समकक्ष शहबाज शरीफ से मिलकर शोक-संवेदना के दो शब्द कहेंगे।
मुझे नहीं लगता कि भारत में ऐसा कोई होगा, जो इसमें दोष ढूंढेगा या मानवीय दृष्टिकोण के लिए उनकी आलोचना करेगा। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पड़ोसी से पूरी तरह परहेज किया। यदि किन्हीं वजहों से ऐसा संभव नहीं था, तो जब मोदी शंघाई सहयोग संगठन की बैठक को संबोधित कर रहे थे, तभी इस विषय पर कुछ बोल सकते थे, क्योंकि यह सर्वविदित था कि वहां उपस्थित दोनों मुल्कों के प्रधानमंत्रियों और विदेश मंत्रियों के बीच कोई औपचारिक द्विपक्षीय वार्ता नहीं होगी।
प्राकृतिक आपदाएं राजनीति का विषय नहीं हैं। पाकिस्तान के साथ अभी जो हो रहा है, वह अगली बार किसी के साथ भी हो सकता है, क्योंकि कुदरत के कहर से कोई नहीं बचा है। कम से कम शंघाई सहयोग संगठन की बैठक एक ऐसा अवसर था, जहां दोनों पक्ष जलवायु परिवर्तन के समान एजेंडा के लिए एक साथ आ सकते थे और दोनों देश एक-दूसरे पर कोई शर्त लादे बिना यह विचार कर सकते थे कि इस मुद्दे पर कैसे एक साथ काम कर सकते हैं।
लेकिन शायद मैं स्वप्न-लोक में जी रही हूं और भू-राजनीति की वास्तविकता बिल्कुल अलग है। काश, मैं पाठकों को एक छोटी लड़की का वीडियो दिखा पाती, जो सौभाग्य से अपने गांव में बाढ़ से बच गई थी, लेकिन बहुत भूखी थी। उस वीडियो में वह खाली बर्तन से कुछ खाने का नाटक करती नजर आ रही है। हो सकता है कि बर्तन के निचले हिस्से में कुछ दाने चिपके हों, जिसे वह इस उम्मीद में खुरचने की कोशिश कर रही हो कि कुछ दाने उसके मुंह में आ जाएंगे।
लेकिन हर बार वह विफल रहती है। ऐसे में यह देखकर वाकई खुशी हुई कि पाकिस्तान के कुछ इलाकों में धर्म ने मानवता और धार्मिक सद्भाव को विभाजित नहीं किया है। जलाल खान के गांव में, जहां कुछ भी नहीं बचा है और नदियों ने बलूचिस्तान को पूरी तरह से काट दिया है, जहां सरकार भी नहीं पहुंच पाई है, स्थानीय हिंदू समुदाय की ओर से मदद की जा रही है, जिन्होंने न सिर्फ बाढ़ से बचे लोगों का, बल्कि उनके मवेशियों का भी स्वागत किया।
जिस मंदिर के माध्यम से हिंदू समुदाय मदद कर रहा है, उसका नाम बाबा माधोदास मंदिर है। माधोदास विभाजन से पहले के हिंदू संत थे और जिनका इलाके के हिंदू और मुसलमान समान रूप से आदर करते थे। इस मुश्किल वक्त में स्थानीय हिंदू समुदाय ने बाढ़ प्रभावित लोगों, जिनमें कई मुस्लिम भी थे, और उनके मवेशियों के लिए मंदिर का द्वार खोल दिया।
स्थानीय हिंदुओं द्वारा लाउडस्पीकर पर घोषणाएं की गईं, जिसमें मुसलमानों से शरण लेने के लिए मंदिर आने का आह्वान किया गया। सामान्य समय में पूरे बलूचिस्तान से हिंदू उपासक बाबा माधोदास मंदिर में पूजा करने के लिए आते हैं। हिंदू समुदाय का कहना है कि आजीविका की तलाश में बहुत से स्थानीय लोग अन्य बड़े शहरों में चले गए और यह एक छोटी-सी आबादी है, जो गांव में बची हुई है।
पूरे इतिहास में, हमने देखा है कि कैसे पूजा स्थल, चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हों, आपदा से बच गए हैं। सौभाग्य से बाबा माधोदास मंदिर ऊंची जगह पर पूरी तरह से कंकरीट से बनाया गया था, इसलिए बाढ़ से यह नष्ट नहीं हुआ। खबरों के मुताबिक, मंदिर में सौ से ज्यादा कमरे हैं, जो पाकिस्तान में सामान्य मानक के मुताबिक बड़ा मंदिर है और सौभाग्य से मंदिर के कुछ ही कमरों को बाढ़ से नुकसान हुआ है।
इस बीच पाकिस्तान के दक्षिणी प्रांत सिंध की राजधानी कराची, जो सौभाग्य से बाढ़ से प्रभावित नहीं है, के प्रसिद्ध बाजार में काफी उत्साह दिखा। हालांकि कई इतिहासकार कराची शहर की पुरातनता को लेकर अलग-अलग दावे करते हैं कि यह शहर कितना पुराना है, लेकिन हाल में प्राप्त एक हिंदू मूर्ति से पता चलता है कि यह बंदरगाह शहर 1,500 वर्ष पुराना हो सकता है। यहां सोल्जर बाजार नामक एक प्रसिद्ध इलाके में एक प्राचीन पंचमुखी हनुमान मंदिर स्थित है।
विशेषज्ञों ने निर्माण कार्य के दौरान खुदाई में कई सौ साल पुरानी मूर्तियों की खोज की, और ऐसी ही एक मूर्ति 1,500 साल पुरानी है। साथ ही कराची के पास तट पर कई द्वीप हैं। ऐसा ही एक द्वीप है मनोरा, जहां मैं कई बार नाव से पिकनिक मनाने गई हूं। अब यह याद करने का समय है कि कैसे मनोरा द्वीप पर आज भी शांति, मानवता और धार्मिक सद्भाव कायम है।
यहां 1890 में बनी सिफा जामिया मस्जिद के अलावा, गुरुद्वारा श्री गुरुनानक साहिब देवजी है, जो 1935 में बना और पीले पत्थरों वाला वरण देवी मंदिर भी है, जो 1623 में बना। ऐसे सैकड़ों-हजारों साल के प्रमाण हैं, जो बताते हैं कि विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच सह-अस्तित्व संभव है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि राजनीतिक बाधाओं और घरेलू दबाव के कारण पाकिस्तान भारत से सब्जियों का आयात नहीं कर सका, जहां से वह सबसे तेजी से सब्जियां मंगा सकता है, जो हाल की बाढ़ में नष्ट हो गई थी।