देश में चीनी और राजनीति की चाशनी इतनी गाढ़ी है कि इनको अलग करना लगभग नामुकिन है। देश के दो बड़े चीनी उत्पादक राज्यों उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की राजनीति इसके सहारे चलती है। पिछले कई दशक से सरकारें और नीति नियंता चीनी उद्योग और गन्ना किसानों का संकट हल करने की कोशिश करते रहे हैं। कई समितियों के बनने और अंततः काफी हद तक चीनी उद्योग को नियंत्रण मुक्त करने का आधार बनी रंगराजन समिति की सिफारिशें लागू करने के बावजूद मुद्दा पहले की तरह उलझा हुआ है।
इस समिति की सिफारिशों के आधार पर मिलों को राशन के लिए लेवी कीमत पर चीनी देने और खुले बाजार में कोटे से चीनी बिक्री की छूट मिल गई थी। लेवी चीनी से उद्योग को करीब 3,000 करोड़ रुपये सालाना का फायदा हुआ है। वहीं केंद्र की पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने 6,000 करोड़ रुपये से अधिक का ब्याज मुक्त कर्ज और निर्यात सब्सिडी का पैकेज दिया था। अब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने पैकेज की घोषणा की है, लेकिन अब भी किसान, उपभोक्ता और उद्योग में से कोई भी पूरी तरह खुश नहीं है। देश में चीनी का मांग से ज्यादा भंडार है और उत्पादन मांग से ज्यादा है, इसके बावजूद सरकार के पैकेज घोषित करने के साथ ही उपभोक्ताओं के लिए बाजार में चीनी के दाम बढ़ गए हैं।
असल में देश में चीनी मिलों की तीन श्रेणियां हैं। निजी चीनी मिलें, सहकारी चीनी मिलें और सार्वजनिक क्षेत्र की चीनी मिलें। महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक में ज्यादातर चीनी मिलें सहकारी क्षेत्र में हैं और इन पर किसानों का मालिकाना हक है। मगर, सही कहें तो इन पर राजनेताओं का कब्जा है। उत्तरी राज्यों में अधिकांश निजी चीनी मिलें हैं और जो सहकारी चीनी मिलें हैं, वे सरकार के नियंत्रण में हैं।
इसी तरह देश में गन्ना मूल्य तय करने और भुगतान की प्रक्रिया भी अलग है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में किस्तों में भुगतान किया जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड में गन्ने की आपूर्ति के 14 दिन बाद भुगतान करने की प्रक्रिया है। जहां उत्तरी राज्यों में राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) तय होता है, वहीं महाराष्ट्र जैसे राज्य उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) के केंद्र सरकार के नए फॉर्मूले की तरफ बढ़ रहे हैं। चालू सीजन में उत्तर प्रदेश में गन्ने का एसएपी 280 रुपये प्रति क्विटंल है। लेकिन महाराष्ट्र की चीनी मिलों ने केवल 250 रुपये प्रति क्विंटल का ही भुगतान किया। नतीजतन उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों पर गन्ना मूल्य का बकाया एक बार 12,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था, जो अब भी 8,000 करोड़ रुपये से अधिक है।
पिछले करीब 20 साल से उत्तरी राज्यों की निजी चीनी मिलें एसएपी को समाप्त करने के लिए लड़ रही हैं, लेकिन 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के एसएपी तय करने के अधिकार पर मुहर लगा दी। केंद्र ने इसकी जगह एफआरपी लागू करने की कोशिश की, लेकिन किसानों और राजनीतिक विरोध के चलते यह नहीं सका। चालू सीजन में उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों ने पेराई से इन्कार कर दिया था। बाद में बीच का रास्ता निकाला गया, जिसके तहत केंद्र और राज्य सरकार ने मिलों को राहत दी।
चीनी मिलों को यूपीए सरकार ने तीन साल के उत्पाद शुल्क के भुगतान के बराबर ब्याज मुक्त कर्ज देने का फैसला लिया, जो 6,000 करोड़ रुपये से अधिक था। चीनी निर्यात पर 3,300 रुपये प्रति टन की सब्सिडी दी। लेकिन पेराई खत्म होने के बावजूद किसानों को भुगतान नहीं मिला। इसी का नतीजा रहा कि किसानों का यह संकट चुनाव में मुद्दा बना और अब जब नई सरकार केंद्र में आई है, तो उसके ऊपर भी दबाव बना हुआ है। पुराने फॉर्मूले पर ही दो साल के अतिरिक्त उत्पाद शुल्क भुगतान के बराबर करीब 4,400 करोड़ रुपये के ब्याज मुक्त कर्ज, निर्यात सब्सिडी को जारी रखने और पेट्रोल में एथनॉल ब्लैंडिंग को 10 फीसदी करने के साथ चीनी आयात पर सीमा शुल्क को 15 फीसदी से बढ़ाकर 40 फीसदी करने की घोषणा की गई। इसका नतीजा यह होगा कि बिचौलिये चीनी का स्टॉक बनाने लगेंगे। गोदामों में चीनी भरी जाने लगेगी। जिसका उपयोग वह आने वाले समय में और दाम बढ़ाने में कर सकते हैं और जिसकी गाज अंततः आम आदमी पर गिरेगी।
सरकारी पैकेज की घोषणा के साथ ही चीनी के दाम पर असर दिखने लगा है। उद्योग भी मानता है कि आने वाले दिनों में चीनी के दाम तीन से चार रुपये तक बढ़ सकते हैं। जबकि अक्तूबर में 2014-15 के सीजन शुरू होने के समय देश में 70 लाख टन से ज्यादा का स्टॉक होगा। चालू पेराई सीजन (2013-14) में उत्पादन 240 लाख टन से ज्यादा रहेगा। ऐसे में दाम बढ़ने की वजह किसी के पास नहीं है।
इस पूरे पैकेज में उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों को 3,000 करोड़ रुपये से कम मिलेगा। पहले पैकेज में 2,053 करोड़ रुपये मांगा था, जिसमें से 1,385 करोड़ रुपये मिला, जबकि नए पैकेज में उत्तर प्रदेश का हिस्सा 885 करोड़ रुपये ही बैठता है, जो चीनी मिलों पर गन्ना किसानों के बकाये से काफी कम है। फिर बड़ी संख्या में ऐसी मिलें भी हैं, जो इस कर्ज की पात्रता पूरी नहीं करती हैं। अगले सीजन में भी मिलें पेराई नहीं करने पर अड़ सकती हैं, जिसका हल राज्य को ढ़ूंढना है। असल में इस सारे संकट की जड़ गन्ना मूल्य है, जब तक इसके लिए कोई सर्वमान्य फॉर्मूला नहीं ढूंढ लिया जाता, तब तक गन्ना किसानों, उपभोक्ताओं और उद्योग के लिए चीनी कड़वी बनी रहेगी। किसानों और उद्योग के बीच भरोसा कायम करना होगा। उसी स्थिति में इस संकट का स्थायी हल निकल सकेगा। संकट बढ़ने पर किस्तों में दिये जा रहे पैकेज राजनीतिक रूप से तो फायदेमंद हो सकते हैं, लेकिन स्थायी हल नहीं बन सकते हैं।