किसी भी सम्मेलन की कार्यक्रम सूची के अंत में लिखा रहता है-'सांस्कृतिक संध्या' या नृत्य कला से संबंधित किसी प्रस्तुति का उल्लेख होता है।
बुडापेस्ट में भारतीय दूतावास के सांस्कृतिक केंद्र में आधारशिला फाउंडेशन के हिन्दी सम्मेलन के अंतिम कार्यक्रम के रूप में भी यही दिया था- 'हंगरी दूतावास के सौजन्य से सांस्कृतिक संध्या'। लेकिन हंगेरियन युवती गाब्रियाला तोत की मोहक नृत्य प्रस्तुति ने सूची को अंतिम कार्यक्रम भर न बना कर यादगार बना दिया।
तुरतुरी नाक, बड़ी -बड़ी गोल आंखों और इकहरी देहयष्टि वाली गाब्रियाला हिन्दी नहीं जानतीं। लेकिन जिस तन्मयता से उन्होंने कुचिपुडी नृत्य प्रस्तुत किया, उससे ये कहावत सही सिद्ध हुई कि कला के लिए भाषा नहीं, भाव ही जरूरी है।
गाब्रियाला का पहला नृत्य 14वीं सदी के मशहूर तेलुगू के श्रृंगार और भक्ति के गीतकार अन्नामचार्या के गीतों पर और शंकराभरनम राग पर आधारित था। दूसरा मोहना राग पर आधारित कृष्ण शब्दम और तीसरा कल्याणी राग पर आधारित लीलाशुक पद्म था।
गाब्रियाला का नृत्य प्रेम रशियन बैले से शुरू हुआ। इस नृत्य नाटिका विधा को उन्होंने दस साल की उम्र में सीखा। प्रस्तुति के बाद टूटी-फूटी अंग्रेजी और हिन्दी के कुछ शब्दों के सहारे उन्होंने अपने बारे में बताया। ‘इसी वय के आसपास मैंने भारतीय नृत्य देखा और बहुत प्रभावित हुई। मुझे लगा कि इसे सीखना चाहिए क्योंकि ये संपूर्ण शास्त्रीय नृत्य है’।
गाब्रियाला का ये सपना 22 साल की उम्र में तब पूरा हुआ जब बुडापेस्ट में पाणिनी सोमी का भरतनाट्यम देखा। सोमी ने गाब्रियाला को तीन साल नृत्य सिखाया। इसके बाद गाब्रियाला सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम की स्कॉलरशिप लेकर भारत आईं। यहां उन्होंने यामिनी कृष्णामूर्ति से भरतनाट्यम और स्वप्न सुंदरी से कुचिपुडी की बारीकियां सीखीं। गाब्रियाला के वर्तमान गुरु तेलुगू विश्वविद्यालय के आलोख्या पुंजाल हैं।
गाब्रियाला अपने देश में भारतीय नृत्य की कक्षाएं चलाती हैं। 20-25 छात्र हमेशा रहते हैं। कहती हैं, ‘भारतीय शास्त्रीय नृत्य का वैविध्य अपूर्व है।’ इसके अतिरिक्त हंगरी का भारतीय दूतावास भी सप्ताह में एक दिन नृत्य की कक्षाएं लगाता है। हंगरी में भारतीय नृत्य की समृद्ध परंपरा के पीछे दूतावास की ये पहल भी है।
अधिकांश भारतीय नृत्य परंपरा कृष्ण केंद्रित हैं। गाब्रियाला के नृत्य भी कृष्ण के चारों तरफ ही घूमते हैं। हंगरी की इस नृत्यांगना पर भी कृष्ण का बहुत प्रभाव है। कहती हैं ‘लगता है कृष्णा ने मुझे इस नृत्य के लिए प्रेरित किया और जहां तक विवाह का प्रश्न है, अभी मुझे मेरा कृष्ण नहीं मिला।’