समस्या बस यही नहीं है, वह बताती हैं, ‘घड़ी का यह बदलाव सूर्योदय व सूर्यास्त के समय को भी बदल देता है। इससे सोने-जागने के समय में तालमेल बिठाने में दिक्कतें आ सकती हैं।’ अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन के प्रवक्ता डॉ. जेम्स रोली कहते हैं, इससे स्कूल, ऑफिस के समय व हमारी जैविक घड़ी के बीच का संतुलन महीनों तक बिगड़ा ही रहता है। इस बदलाव को कम असुविधाजन बनाने के लिए विशेषज्ञ कुछ सुझाव देते हैं। एरिजोना यूनिवर्सिटी में नींद और स्वास्थ्य शोध कार्यक्रम के निदेशक डॉ. माइकल ग्रैंडनर कहते हैं कि इस बदलाव से बचने का सबसे आसान तरीका यह है कि घड़ी क्या बता रही है, इस पर फोकस करने के बजाय सात या आठ घंटे तक पर्याप्त नींद लें। वह कहते हैं, ‘समय का यह बदलाव, खासकर उन लोगों के लिए कठिन हो सकता है, जो रोज जल्दी उठते हैं, लेकिन सप्ताहांत देर तक सोते हैं, जिसे ‘सोशल जेट लैग’ कहा जाता है। इससे बचने के लिए जरूरी है कि ऋतु में परिवर्तन के दिनों में अपनी दिनचर्या में बड़े बदलाव करने के बजाय, उसे धीरे-धीरे बदलें।
डरहम में स्लीप मेडिसिन मनोवैज्ञानिक डॉ. जेड वू कहती हैं कि 15 मिनट पहले सोने और जागने का अभ्यास करने से ऋतु परिवर्तन के काल में मदद मिलती है। डॉ. वू ने कहा कि यह बदलाव उन लोगों के लिए विशेष रूप से सहायक हो सकता है, जो दिनचर्या में बदलाव से जूझते हैं, जैसे कि छोटे बच्चे और मनोभ्रंश से पीड़ित वयस्क। इसलिए विशेषज्ञ वसंत ऋतु में सप्ताहांत की नींद को नियंत्रित करते हुए रविवार का आनंद लेने की सलाह देते हैं। घूमें-फिरें, दोस्तों व परिवार के साथ समय बिताएं। यदि दिन भर व्यस्त रहेंगे, तो रविवार को नींद जल्दी आएगी, जिससे अगले दिन तरोताजा होकर अपने काम पर जाएंगे। वहीं, विशेषज्ञ नींद से होने वाली थकावट को दूर करने के लिए कॉफी या फिर शराब के सेवन से बचने की सलाह देते हैं। दिन बड़े होने पर भूख भी ज्यादा लगती है, इसलिए भोजन की मात्रा से अधिक पोषण पर ध्यान देने की भी सलाह दी जाती है।