फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बिहार हंस रहा है

Mon, 12 Oct 2015 07:46 PM IST
सुधीर विद्यार्थी
विज्ञापन
विज्ञापन
साधो, इन दिनों बिहार हंस रहा है। क्या आपको वह हंसी सुनाई नहीं पड़ रही? एकदम खिली-खिली हंसी। फूल की मानिंद। बिहार पहले भी हंसा था, जब देश में संपूर्ण क्रांति का नारा गूंजा था, पर वह क्रांति जल्दी ही एक संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस ट्रेन में तब्दील हो गई। तब बिहार के हिस्से में बस एक खोखली हंसी आई थी। लेकिन इस पर भी बिहार रोया नहीं। वह खुली आंखों से उम्मीद के सपने देखता और हंसता रहा।
विज्ञापन


यह हंसी बिहार का स्थायी भाव है। वह अपने पिछड़ेपन और गरीबी में भी मुस्कराता और जीता है। इस मुस्कराने में उसका रुदन भी शामिल है। वह अपना रुदन किसी को दिखाना नहीं चाहता। वह समझ नहीं पाता कि इन दिनों उसकी छाती पर जो युद्ध लड़ा जा रहा है, वह चुनावी समर है या जातियों के मध्य सिर फुटौव्वल। यह सब देखकर उसके भीतर खून के आंसू हैं।

बिहार में अब कोई बिहारी नहीं रहा। सब ब्राह्मण, भूमिहार, पिछड़े, दलित, महादलित और पसमांदा में तब्दील हो गए। वोट की राजनीति बिहार की धरती पर छुट्टा सांड की तरह विचरण कर रही है। सभी दलों का मंसूबा बिहार को चरने का है। उनके लिए बिहार हरियाली भरा खूबसूरत मैदान है।
विज्ञापन


अजीब दृश्य है कि भाजपा के एक अदद बिहारी बाबू और सुशासन बाबू एक दूसरे की गलबलियां डाले घूम रहे हैं। बिहार के छोटे मोदी कहे जाने वाले तो इतने सुशील हैं कि थोड़े दिन पहले जिनके गले का वह कंठहार थे, इन दिनों उनकी आस्तीन का सांप बने हुए हैं। फिर भी बड़े वाले मोदी के बिना भाजपाइयों का काम नहीं चल रहा।

मांझी और पासवान 'तू डाल डाल मैं पात पात’ हो रहे हैं। महागठबंधन की मुलायम-पींगें ज्यादा दिन नहीं चल पाईं। राजनीति का इश्क होता बड़ा हरजाई है। तो क्या मुलायम, ओवैसी, मांझी और पासवान मिलकर कमल का फूल खिलाएंगे? लगता है, खांटी, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर बिहार किसी को नहीं चाहिए। लूट के माल के बंटवारे पर सबकी नजर है। यह तस्वीर बहुत डरावनी नहीं है क्या?
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें