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मंत्र और माला के साथ जनता का विश्वास भी जरूरी है

आलोक मेहता Published by: आलोक मेहता Updated Tue, 03 Nov 2020 07:39 AM IST
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नीतीश कुमार-तेजस्वी यादव (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

मुंह से मंत्र और हाथ में माला हो, जाप कर्पूरी ठाकुर और गांधी का हो, लेकिन केवल सत्ता के माल पर नजर रखेंगे, तो जनता कितना विश्वास करेगी? बिहार के चुनाव में असली समस्या यही है। अधिकांश राजनीतिक दल और उनके नेता जननायक कर्पूरी ठाकुर का नाम लेकर गरीब और पिछड़ों का जीवन बदलने का वादा करते दिखते हैं, लेकिन क्या उनका संकल्प और व्यवहार कर्पूरी जी की तरह है?



कर्पूरी ठाकुर ने आपातकाल के बाद मुख्यमंत्री बनने पर मुझे साप्ताहिक हिंदुस्तान के लिए दिए गए अपने पहले इंटरव्यू में जुलाई, 1977 में कहा था, 'हम भ्रष्टाचार पर चौतरफा प्रहार करेंगे। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए जनता की सतर्कता नितांत जरूरी है। सत्ता के आसपास भ्रष्ट अवसरवादियों को शरण या तरजीह बिल्कुल नहीं मिलनी चाहिए, वर्ना वे मुझे नहीं, तो मेरे बेटे या संबंधियों को भ्रष्ट करेंगे। बिहार और देश के कई हिस्से में पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण सामंती-जमींदारी व्यवस्था रही है। इन क्षेत्रों में पुरुषार्थ प्रायः मर-सा गया। जब पुरुषार्थ ही नहीं रहा, तो परिश्रम, पहल तथा जोखिम उठाने का साहस भी नहीं रहा।



दूसरा कारण बिहार में जातिवाद का असर कुछ ज्यादा ही है। राज्य की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा काम करता ही नहीं है। कम से कम काम और अधिक से अधिक पाने-खाने की प्रवृत्ति प्रगति में बाधक ही तो है।' चार दशक के बाद भी उनकी यह स्पष्टोक्ति एक हद तक आज भी सही है। भ्रष्टाचार और जातिवादी राजनीति देश की प्रगति में बाधक हैं। लालू यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी जैसे नेता ही नहीं, अन्य दलों के कई नेता कर्पूरी जी के बल पर ही सत्ता तक पहुंचे हैं। लेकिन उनकी तरह सादगी, ईमानदारी और जनता का विश्वास कितनों के पास है? कर्पूरी जी और भोला पासवान शास्त्री शीर्ष पदों पर रहे, लेकिन हमने उन्हें दिल्ली में भी राजपथ की सड़कों पर अकेले बहुत साधारण धोती-कुर्ते में पैदल आते-जाते देखा था।


पटना या दिल्ली में भी सुबह आठ से रात बारह बजे तक उनके दरवाजे न केवल पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए, बल्कि सामान्य लोगों की गुहार के लिए खुले रहते थे। यही नहीं, आगंतुक को वे स्वयं कहते थे, अगली बार फिर आइएगा, तो और बात होगी। अब ऐसे कितने नेता मिलते हैं? तभी तो जनता दुखी, भ्रमित होकर किसी एक दल को भारी बहुमत नहीं दे पाती। बिहार में श्रीकृष्ण सिंह और भागवत झा आजाद जैसे ईमानदार कांग्रेसी मुख्यमंत्री भी रहे, लेकिन पार्टी के ही भ्रष्ट और प्रदेश में सक्रिय माफिया ने उन्हें अधिक समय सत्ता में टिकने नहीं दिया।


इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जयप्रकाश नारायण और कर्पूरी जी का नाम लेकर सत्ता में आने वाले लालू यादव ने मुख्यमंत्री बनते ही लूट शुरू कर दी। उन्होंने 15 साल के अपने राज में गरीब को जुबान जरूर दी, लेकिन उनकी रोजी-रोटी छीन ली। आज अपने पाप की सजा पाने के बावजूद उनके इशारे पर चलने वालों के रंग-ढंग वैसे ही लग रहे हैं। सत्ताधारियों ने जमीन, पानी, खेती के सही उपयोग और छोटे, लघु और मध्यम श्रेणी के उद्योगों की स्थापना के लिए पूरा ध्यान नहीं दिया। अंग्रेजी राज की तरह आज भी बिहार ही नहीं, उत्तर भारत के लोग सरकारी नौकरी-बाबू, सिपाही, चपरासी बनने के लिए घर की जमीन तक बेच देते हैं। यह क्या गुलामी की मानसिकता नहीं है?


इस बार भी लालू के उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव ने सत्ता में आने पर पहले ही दिन दस लाख लोगों को सरकारी नौकरियां देने के आदेश पर दस्तखत करने की घोषणा कर दी है। भाजपा ने चतुराई से निजी क्षेत्र को जोड़कर सत्रह लाख नौकरी का वादा कर दिया है। जो युवा किसी कौशल विकास केंद्र में कारीगरी सहित विभिन्न क्षेत्रों का सही हुनर सीखकर स्वयं कोई काम-धंधा करके महीने में पच्चीस-पचास हजार रुपये कमा सकता है, उसे भ्रष्ट तरीके से नौकरी लेकर जिंदगी भर निठल्ला रहने का प्रलोभन देश को कैसे प्रगति दिला सकेगा? दुनिया के किस लोकतांत्रिक देश में नेता सरकारी नौकरियों का वादा करते हैं?


उनका लक्ष्य रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना होता है। गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे राज्यों में क्या अधिकाधिक लोग सरकारी नौकरियों में हैं? इन प्रदेशों में अन्य राज्यों से अधिक प्रगति और संपन्नता का कारण उद्योग-धंधे, कृषि का अधिक लाभकारी सदुपयोग रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शायद इसीलिए निरंतर कौशल विकास, स्वरोजगार,सड़क, जल, मकान और स्वास्थ्य की योजनाओं को सर्वाधिक प्राथमिकता दी। समस्या राज्य सरकारों द्वारा उनके क्रियान्वयन की है। इसी कारण हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार में ही नहीं, दूसरे राज्यों में भी सिपाही, शिक्षक, बाबू की सरकारी नौकरियों की भर्ती में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के गंभीरतम अपराध हुए और ओमकाश चौटाला सहित कई नेता-अफसर जेल में हैं।
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इसी तरह निजी क्षेत्र में भारतीय कंपनियों की तरह बहुराष्ट्रीय विदेशी कंपनियों को पिछड़े इलाके में उद्योग लगाने के लिए पहले नेता-अफसरों की सेवा करनी पड़ती है और फिर स्थानीय स्तर पर भी जमीन, पानी, बिजली इत्यादि सुविधा की स्वीकृति के लिए महीनों भटकना पड़ता है। बीती सदी के नब्बे के दशक में मुझे बिहार में कुछ ऐसे प्रभावशाली लोग मिले, जिन्होंने बताया कि उद्योग लगाने या वहां बनाया सामान बेचने से होने वाली आमदनी से अधिक रिश्वत का आंकड़ा समझने के बाद उन्होंने बिहार को अपने व्यापारिक नक्शे से हटा दिया। यही कारण है कि बिहार के लाखों योग्य, मेहनती युवा देश के अन्य भाग या विदेश में नाम और अच्छी कमाई करके सफल हो रहे हैं। स्वदेश वापसी के लिए उन्हें सही वातावरण और अवसर की प्रतीक्षा रहती है। इसलिए जनता का ही नहीं, देश के पूंजी निवेशकों या युवा उद्यमियों का विश्वास अर्जन करना बिहार के राजनेताओं की सबसे बड़ी चुनौती है।



 

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