डरबन में हाल ही में संपन्न ब्रिक्स के सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका को अफ्रीका में पाए जाने वाले पांच ताकतवर जानवरों सिंह, हाथी, भैंसा, तेंदुआ और गेंडे से जोड़ते हुए उन्हें 'बिग फाइव' करार दिया। ब्रिक्स को लेकर जो लोग उत्साहित हैं, उनके लिए यह छवि ताकत और श्रेष्ठता के प्रदर्शन जैसी है। मगर ऐसे भी लोग हैं, जो ब्रिक्स को लेकर संदेह जताते हैं, जिनका नजरिया इससे ठीक उलट है।
विकसित दुनिया के ब्रिक्स के आलोचक और इसे संदेह से देखने वाले चौकस हैं कि आखिर इन उभरती अर्थव्यवस्थाओं की एकजुटता वैश्विक व्यवस्था को किस तरह प्रभावित कर सकती है। पश्चिमी दुनिया में अनेक लोग ब्रिक्स को चुनौती के तौर पर देख रहे हैं। मगर पिछले हफ्ते ही ब्रिक्स देशों के मतभेदों पर केंद्रित एक खबर की सुर्खी थी, ब्रिक्स के 'बिग फाइव' का एक झुंड में बने रहना मुश्किल।
ब्रिक्स को लेकर इस तरह का अविश्वास नया नहीं है। असल में जब कभी ब्रिक्स देश एकजुट होते हैं, आलोचक शोर मचाने लगते हैं कि इन पांचों देशों में किस तरह के सैद्धांतिक दुराव हैं और वे घोषणा कर डालते हैं कि इनके सालाना सम्मेलनों में कुछ भी ठोस निकलने की संभावना नहीं है। इस बार तो यह भी कहा जा रहा था कि इन सबमें सबसे अमीर चीन अपनी ताकत के दम पर ब्रिक्स पर प्रभुत्व कायम कर लेगा।
हालांकि इस बार ब्रिक्स के पांचों सदस्य देशों के नेताओं ने एक ब्रिक्स बैंक और सदस्य देशों के लिए सुरक्षा कवच प्रदान करने वाले 100 अरब डॉलर के आपात कोष की स्थापना पर सहमति जताई है। इसके अलावा अन्य मुद्दों पर भी उनमें बात हुई है। ब्रिक्स के आलोचकों को यह जानकार हैरान नहीं होना चाहिए कि ब्रिक्स की शुरुआत ब्रिक (ब्राजील, रूस, भारत और चीन) के रूप में हुई थी।
यह नाम मल्टीनेशनल इन्वेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन सैश के वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रमुख जिम ओ नील ने दिया था। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के इससे जुड़ने के बाद यह ब्रिक्स हो गया। आज यह दुनिया के 25.9 फीसदी भू-भाग को समेटे हुए है, जिसमें दुनिया की 43 फीसदी आबादी रहती है और जिसकी वैश्विक कारोबार में 17 फीसदी की हिस्सेदारी है।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की हाल की एक रिपोर्ट कहती है, 2020 तक ब्रिक्स के तीन देशों ब्राजील, चीन और भारत का साझा आर्थिक उत्पादन कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन और अमेरिका के साझा उत्पादन को पार कर सकता है। ब्रिक्स पर सार्वजनिक विमर्श इसके नाटकीय आर्थिक प्रभामंडल पर केंद्रित है और यह पूछा जा रहा है कि क्या यह वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बदल तो नहीं देगा।
असल में जिन्हें संदेह है, वह यह दर्ज कर रहे हैं कि ब्रिक्स की आर्थिक रफ्तार धीमी हुई है, इसलिए उन्हें लगता है कि क्या इसका असर उनकी महत्वाकांक्षी योजनाओं पर भी पड़ेगा। लेकिन ब्राजील के राजनीतिक विज्ञानी ओलिवर स्टुएनकेल कहते हैं, 'जो लोग यह तर्क दे रहे हैं कि विकास की रफ्तार धीमी होने के कारण ब्रिक्स मुरझाने को अभिशप्त है, वे शायद उन कारणों की ओर नहीं देख पा रहे हैं, जिन्होंने संस्थागत सामंजस्य को सबसे ऊपर ला दिया है।
ब्रिक्स ने साउथ-साउथ कोऑपरेशन (विकासशील देशों या दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों के बीच संसाधनों, तकनीक और ज्ञान का सहयोग) को बढ़ावा दिया है, जिसने पिछले दो दशकों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। विकास की धीमी रफ्तार अकेले उभरती ताकतों की साझेदारियों को कमजोर नहीं कर सकती। आखिर साउथ-साउथ कोऑपेरशन उभरती ताकतों के वैश्विक मामलों के लोकतांत्रिकीकरण करने और हाल तक वैश्विक विमर्श में कायम रहे उत्तरी गोलार्द्ध के बेजा दबाव को कम करने के प्रयासों का एक अहम तत्व है।' भारतीय नजरिये से यह एक केंद्रीय मुद्दा है।
ब्रिक्स का सदस्य होने के नाते ऐसा नहीं है कि भारत किसी और संगठन की सदस्यता नहीं ले सकता। ब्रिक्स तो एक जैसी या खास तरह की चुनौतियों का सामना कर रही उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच तालमेल बनाने वाले किसी अन्य मंच की तरह ही है। ब्रिक्स देशों में तेजी से बढ़ती मध्यम वर्गीय आबादी के साथ ही दुनिया के गरीबों का एक बड़ा हिस्सा भी रहता है। आर्थिक विकास और व्यापक आधार वाले समेकित विकास के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाए? दुनिया के सामने यही बड़ी चुनौती है, और ब्रिक्स देशों के सामने एक-दूसरे से सीखने और अन्य देशों को रास्ता दिखाने का अनूठा अवसर है।
उदाहरण के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को ही लें। ब्राजील विकास के ऐसे मॉडल की पेशकश करता है, जिसमें आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय को आपस में जोड़ दिया गया है। ब्राजील का प्रसिद्ध कार्यक्रम 'बोल्सा फैमिलिया' एक राष्ट्रीय प्रणाली है, जिसके जरिये गरीबों को सशर्त कैश ट्रांसफर की सुविधा दी जाती है, ताकि वे अपने बच्चों को स्कूल भेज सकें। दुनिया के लिए यह मॉडल प्रेरणादायी हो सकता है।
इसी तरह भारत दुनिया में सबसे सस्ती वैक्सिन और जेनेरिक दवाओं का निर्माण करता है। यही नहीं, पिछले दो वर्षों से हमारे यहां पोलियो का एक भी मामला दर्ज नहीं किया गया है। यह अनूठी उपलब्धि भारत के अपने संसाधनों में निवेश और व्यापक जागरूकता का नतीजा है और अब पोलियो अभियान की सूक्ष्म नीतियों का उपयोग टीकाकरण अभियान में किया जा सकता है। चीन ब्रिक्स देशों में सबसे बड़ा दानदाता है और उसने स्वास्थ्य सेवाओं और दवाओं की खोज में महत्वपूर्ण निवेश किए हैं। रूस ने एड्स, टीबी और मलेरिया जैसी बीमारियों के वैक्सिन और टीकाकरण में निवेश किया हैं।
तो क्या ब्रिक्स स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, अक्षय ऊर्जा और बौद्धिक संपदा अधिकारों जैसे विषयों के लिए नए कायदे बनाने को तैयार है, ताकि इसका लाभ निचले क्रम के देशों को भी हो सके?