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बिगड़ी हुई चीजें खुद-ब-खुद नहीं संवर जाती

Sat, 30 Mar 2013 11:00 PM IST
उमेश चतुर्वेदी
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कभी हिंदी पाठकीयता की श्रीवृद्धि में अहम स्थान रखने वाली ललित निबंध विधा अब भूले-भटके वाली विधा हो गई है। कारपोरेट दबाव में अब सीधी सपाट बयानबाजी पत्रकारिता में अहम स्थान बना चुकी है। इस बीच भी अगर कोई पत्रकार अपने लेखन में लालित्य को बचाए रख सका है तो निश्चित तौर पर उसे दाद देनी ही पड़ेगी।
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तरुण विजय अब महज पत्रकार ही नहीं रहे, बल्कि सांसद हो गए हैं। लेकिन उनके लेखन का लालित्य अब भी बरकरार है और हिंदी के चुनिंदा अखबारों में सामयिक विषयों पर भी उनका भावोत्मक लेखन जारी है। 'मन तुलसी का चौरा' उनके ऐसे ही अखबारी लेखों का संग्रह है, जिसे पढ़ते हुए आपको एक बार भी नहीं लगेगा कि आप अखबारी लेखों से गुजर रहे हैं।

तरुण विजय के लेखन को हिंदुत्ववादी होने के आरोप में एक वर्ग भले ही नकारने की कोशिश करे, लेकिन सच तो यह है कि उनके लेखन में भारतीयता की अजस्र धारा लगातार बहती रहती है। जाहिर है कि उनकी रचनात्मक दृष्टि में सांस्कृतिक भारत की महान खासियतें भी अपनी पूरी करुणा और जिजीविषा के साथ सामने आती हैं। इस पुस्तक में अनेक स्थल ऐसे हैं, जिन्हें उद्धृत किया जा सकता है।
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पुस्तक की भूमिका में रमेश चंद्र शाह ने इस संग्रह के पहले ही लेख मन तुलसी का चौरा का एक अंश उद्धृत किया है- 'देश का मन और जल दोनों गंदला गए हैं। दिल्ली में यमुना का आचमन तो दूर, स्पर्श तक नहीं किया जा सकता। पीढ़ियों से अपने धार्मिक संस्कार सुरक्षित रखे सूरीनाम और त्रिनिनाद के लोग काशी गए तो गंदगी से भरी गलियां,..और ईश्वरोपासना की पहली ही सीढ़ी पर जाति के जुगुप्साजनक अहंकार का परिचय।

...अब कोई विधर्मी नहीं, जो हमारी गंगा, जमुना या मंदिरों को गंदा करने आते हों। यह काम हम खुद ही करते हैं।' अपने इस विचार से तरुण विजय साफ कर देते हैं कि आखिर किस कदर हमारा अपना ही समाज अपने दोषों के लिए जिम्मेदार है। हिंदुत्व के विरोध में जब भी आवाज उठती है, तब हिंदुत्व के पैरोकारों पर ही सवाल उठते हैं। तरुण विजय उन्हीं पैरोकारों में से हैं। लेकिन उनके लेखन का स्वर तो कुछ और ही नजर आता है।

तरुण विजय देश भर की यात्रा भी करते रहे हैं। इन यात्राओं के दौरान देश के उस इलाका विशेष की संस्कृति और परंपराओं को देखने के पीछे बेशक उनकी सांस्कृतिक दृष्टि ही रही हो, लेकिन इसके बावजूद भारतीय राष्ट्रीयता की अवधारणा से लगातार दूर होते उस इलाके के दर्द को उभार पाने में तरुण कामयाब रहते हैं। कण्णगी का पुनर्जन्म हो या कोहिमा की कूकीथोई के प्रश्न...तरुण का यह दर्द हर जगह छलकता ही रहता है।

तरुण के इस संग्रह में कहीं सतलुज की धारा अपने पूरे तेजोमय संस्कार को लेकर उत्तर की संस्कृति को प्रतिध्वनित कर रही है तो कहीं कावेरी भी अपने पूरे उल्लास के साथ है। लेकिन सबका मूल स्वर एक ही है कि आधुनिकता की दौड़ और नई राजनीति के दबाव में अपनी जो भारतीयता रही है, कहीं ना कहीं खो जरूर गई है और बिगड़ी हुई चीजें खुद-ब-खुद संवर नहीं जाती, इसलिए संग्रह के जरिये तरुण अपनी भारतीयता को बचाने की कोशिश करते हुए दिखते हैं।
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लेखक– तरुण विजय
प्रकाशक– वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य- 495 रुपये
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