मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली केंद्र की यूपीए सरकार इन दिनों अपने नौ साल के कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाने का अभियान चला रही है। इसे नाम दिया गया है, भारत निर्माण।
नारा अच्छा है और लोगों की जबान पर चढ़ता है। शायद इसीलिए यूपीए के रणनीतिकारों को लगा कि राजनीतिक फसल काटने के लिए इसके जरिये मतदाताओं के साथ बेहतर संवाद हो सकता है। यही वजह है कि नौ वर्षों की तथाकथित उपलब्धियों को भारत निर्माण के नारे में ही समाहित कर दिया गया है।
लेकिन एक कड़वी सच्चाई इस भारत निर्माण के शोर में छिपाने की कोशिश हो रही है। वह है, यूपीए सरकार के कार्यकाल में रोजगार के नए अवसर पैदा न कर पाने की अक्षमता।
सरकार का तर्क यह हो सकता है कि पांच फीसदी की कमजोर विकास दर इसके लिए जिम्मेदार है। लेकिन यूपीए के पहले कार्यकाल में जब विकास दर आठ फीसदी से अधिक थी, तब भी रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं हुए। जबकि हर साल एक करोड़ से ज्यादा लोग कामकाज की तलाश करने वाले लोगों में जुड़ते जा रहे हैं।
मनरेगा जैसे अस्थायी उपायों के सहारे रोजगार के नए अवसर पैदा करने का दावा करने वाली सरकार को यह सच्चाई लोगों को बतानी चाहिए कि देश में संगठित क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं हो रहे। सरकारी संस्था राष्ट्रीय सांख्यिकीय आयोग के मुताबिक, 2004-05 से 2009-10 के बीच रोजगार के नए अवसर बिल्कुल ही पैदा नहीं हुए।
इसी तरह विकास की चमक दिखा रहे सरकारी विज्ञापनों के उलट सच्चाई यह है कि देश में आज भी 85 फीसदी लोग अनियमित क्षेत्रों में काम करते हैं, जिनको किसी तरह की सामाजिक सुरक्षा या नियमित आय का सहारा नहीं है। मात्र चार फीसदी लोग ही संगठित क्षेत्र में हैं, जो सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं और नियमित वेतन पाते हैं।
संगठित क्षेत्र के सरकारी और गैरसरकारी संस्थानों में कैजुअल या कांट्रेक्ट कर्मचारियों की संख्या इससे दोगुनी है। पहली बार वित्त मंत्रालय ने आर्थिक समीक्षा में रोजगार पर जो चैप्टर जोड़ा है, उसमें साफ कहा गया है कि बेहतर गुणवत्ता के नए रोजगार अवसरों के बिना समावेशी विकास संभव ही नहीं है।
वर्ष 2010 तक देश की 51 फीसदी कामकाजी आबादी कृषि क्षेत्र में कार्यरत थी। जबकि उद्योग में 22 फीसदी और सेवा क्षेत्र में 27 फीसदी लोग काम कर रहे हैं। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि की हिस्सेदारी मात्र 14 फीसदी के आसपास सिमट गई है, जबकि सेवा क्षेत्र 60 फीसदी के करीब पहुंच रहा है।
खास बात यह है कि औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले 22 फीसदी लोगों में से आधे से ज्यादा लोग विनिर्माण क्षेत्र में काम करते हैं, जिसे मैन्यूफैक्चरिंग में शामिल करना सही नहीं होगा। इसी तरह सेवा क्षेत्र के अधिकांश रोजगार अनियमित और कैजुअल की श्रेणी में आते हैं। ये आंकड़े देश में रोजगार की गुणवत्ता और वेतन की खस्ता हालत को भी बयान करते हैं।
सबसे निराश करने वाली बात यह है कि देश-विदेश में तमाम मंचों पर प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री लगातार यह दावा करते हैं कि कामकाजी लोगों की सबसे बड़ी तादाद के चलते हम चीन से भी आगे निकल जाएंगे। लेकिन चीन में 2002 से 2012 के बीच सेवा क्षेत्र की तेज विकास दर के बीच 13 करोड़ नई नौकरियां पैदा हुईं।
भारत में स्थिति इसके उलट है। 2004-05 से 2009-10 के बीच कोई भी नई नौकरी नहीं जोड़ी गई। जबकि इसके पहले के पांच साल में रोजगार के छह करोड़ नए अवसर पैदा हुए थे।
असल में इस हालत के लिए सरकार की नीतियां और कामकाज का तरीका ज्यादा जिम्मेदार है। अस्पष्ट नीतियों और फैसलों में देरी के चलते नया निवेश नहीं आ रहा और न ही नई मैन्यूफैक्चरिंग क्षमता स्थापित हो रही है। भारतीय कंपनियां भी विदेशों में ज्यादा निवेश कर रही हैं।
एक अनुमान के मुताबिक, भारत में अगर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के रूप में एक डॉलर आता है, तो भारतीय उद्यमी 65 सेंट बाहर निवेश कर रहे हैं। मानव श्रम के बजाय मशीनों को प्राथमिकता दी जा रही है। ऑटो उद्योग में बड़े पैमाने पर रोबोट का इस्तेमाल हो रहा है। या फिर श्रम कानूनों से बचने के लिए उन्होंने कांट्रैक्ट लेबर का रास्ता निकाल लिया है जिनको नियमित कर्मचारियों के मुकाबले आधा वेतन मिलता है।
इसका परिणाम श्रमिक विवाद के रूप में भी सामने आता है। मारुति सुजुकी के मानेसर प्लांट में हिंसा का यह एक बड़ा कारण था। हमारी सरकार को केवल नारे और आकर्षक विज्ञापन दिखाने के बजाय पड़ोसी देशों से कुछ सीखना चाहिए। टेक्सटाइल के क्षेत्र में चीन से बाहर जाते रोजगार का फायदा श्रीलंका, वियतनाम और बांग्लादेश ने उठाया है।
चीन में बढ़ते वेतन के कारण बाहर जा रहे मैन्यूफैक्चरिंग रोजगार इंडोनेशिया और वियतनाम में जा रहे हैं, जबकि हम बड़े पैमाने पर इन सामान का आयात कर रहे हैं। सरकार ने पहले स्पेशल इकोनामिक जोन (एसईजेड) के सहारे भारत को मैन्यूफैक्चरिंग और निर्यात का हब बनाने का ख्वाब दिखाया था, लेकिन यह प्रयोग फेल हो गया।
अब नेशनल मैन्यूफैक्चरिंग जोन और दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (डीएमआईसी) के सहारे रोजगार और विकास को गति देने की बात हो रही है। लेकिन इन महत्वाकांक्षी परियोजनाओं पर काम बहुत तेजी से आगे नहीं बढ़ रहा है।
बेहतर होगा कि सरकार गंभीरता से इस मोर्चे पर काम करे और जिस डेमोग्राफिक डिविडेंड को एक बड़ी ताकत के रूप में पेश कर रही है, उसके लिए खुद की ईमानदार कोशिशों को लोगों के सामने रखे।