एक लड़की रात को परीक्षा की तैयारी कर रही थी। उसे उम्मीद थी कि उसका स्कूल जल्द खुलेगा और उसे परीक्षा देनी पड़ेगी। उसने लैंप जला रखा था। उसे नहीं पता था कि ऐसा करना भी कर्फ्यू का उल्लंघन माना जाएगा। दीवार फांदकर उसके घर के अंदर फौजी आ गए और उसके बाप और भाई को ‘पूछताछ’ के लिए ले गए। वे घर लौटकर नहीं आए हैं। आसपास के घरों में अब रात को चिराग नहीं जलता। चार साल की एक बच्ची रात के अंधेरे में कुत्ते का भौंकना सुनती है, तो अपने होंठ पर उंगली लगाकर सबको चुप कराती है। कुत्ते के भौंकने से फौजियों के पास होने का संकेत मिलता है। छोटी बच्ची को अगर रात में शौच के लिए ले जाना होता है, तो मां डर के मारे टॉर्च नहीं जलाती। कश्मीर से विगत 25 सितंबर को लौटी महिलाओं के प्रतिनिधिमंडल ने अपने लंबे बयान में बांदीपुर के बारे में यह छोटी-सी जानकारी दी।
विगत पांच अगस्त को कश्मीर को ठीक करने का काम नए सिरे से शुरू हुआ। संविधान से एक अनुच्छेद हटा दिया गया। कश्मीर को दो केंद्र शासित टुकड़ों में तोड़ दिया गया। कश्मीरियों को सुरक्षित रखने के लिए कर्फ्यू लगाकर उनको घरों में बंद कर दिया गया। उनके मोबाइल फोन और इंटरनेट की सेवा बंद कर दी गई। गर्भवती महिलाएं अस्पताल कैसे पहुंचेंगी? राशन घरों में कैसे पहुंचेगा? बेटा अपनी मां का हाल कैसे जानेगा? बेटी कैसे पता करेगी कि बीमार बाप ने दवा ली है या नहीं? बड़े काम के लिए छोटे दुख बर्दाश्त करने पड़ते हैं।
पांच अगस्त के फौरन बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री ने पूरे देश को जानकारी दी कि सब कुछ कितना ठीक होने वाला है। सरकार का यह फैसला उनके प्रांत के नौजवानों की निराशा और परेशानी किस तरह दूर कर देगा, इसका खुलासा उन्होंने किया : अब वे नौजवान बड़ी आसानी से कश्मीरी लड़कियों से शादी कर सकेंगे। इस घोषणा के बाद, गूगल पर ‘कश्मीरी लड़की से शादी कैसे' सबसे लोकप्रिय सवाल बन गया। उनका यह सवाल, और उससे कहीं ज्यादा एक सार्वजनिक प्रतिनिधि का घटिया बयान कश्मीरी महिलाओं को कितना अपमानित करने वाला था, इसकी चिंता किसको थी?
बहत्तर दिन के बाद कश्मीर में मोबाइल फोन काम करने लगे हैं। आतंकवादियों को सबक सिखाने का यही सही तरीका था। और कश्मीर में आतंकवादी के अलावा है कौन? इसके बावजूद दस दिन पहले उन्हीं में से 6,500 को सेना में भर्ती किया गया है। ये 6,500 कश्मीरी तो देशभक्त होंगे। तो क्या कश्मीर में देशभक्त भी हैं? ऐसे लोग भी हैं, जो आतंकवादी नहीं हैं? अगर हैं, तो फिर सजा सब को क्यों दी जा रही है? ढाई महीने होने वाले हैं-सबके स्कूल बंद हैं, सबका काम बंद है, सब डर की कैद में जी रहे हैं, कुछ बच्चे जेल में हैं, कश्मीर और बरेली और आगरा की जेलों मे कश्मीरी मर्द बंद हैं, कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा मानने वाले नेता नजरबंद हैं, सबका इंटरनेट अब भी बंद है। आतंकवाद को जड़ से उखाड़ने के लिए सबको सजा देना अनिवार्य था।
इतना सब होने के बाद अब सरकार कह रही है कि आतंकवादी दुकान खुलने नहीं दे रहे, सेब की फसल ट्रकों में लादने नहीं दे रहे, बच्चों को स्कूल जाने नहीं दे नहीं रहे। चप्पे-चप्पे पर पुलिस, अर्ध-सैनिक बल और फौजी लगे हैं, फिर भी आतंकवादियों की ही चल रही है। ठीक होने में अभी बहुत कुछ बाकी है-उधर भी, इधर भी।
(लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।)