इतना तो तय है कि लगभग दो महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव पिछले चुनावों से एकदम अलग तेवर और अलग नतीजों वाले होंगे। पहली बात यह कि ये चुनाव पिछले किसी भी चुनाव से अधिक कटु और कर्कश होने जा रहे हैं। राजनीतिक उथलेपन के दर्शन तो देहमंडी की भाषा से भी गए-बीते आरोप-प्रत्यारोपों के रूप में अभी से हो रहे हैं। यह हालत तब है, जबकि देश के लिए ये सबसे निर्णायक चुनाव हैं। इनसे तय होगा कि बदहाली के इस सबसे बुरे दौर में शासन की स्पष्ट अवधारणा वाले सुदृढ़ और सक्षम नेतृत्व में सरकार की स्थिरता को अहमियत मिलती है या फिर किसी लश्टमपश्टम गठबंधन को, जो जब तक रहे, राजकाज के हिसाब से वेंटिलेटर पर ही नजर आए।
बेशक अगले चुनावों का मुख्य स्वर मजबूत नेतृत्व और सुशासन की आकांक्षा तथा भ्रष्टाचार और महंगाई के विरूद्ध आर्तनाद के बतौर गूंज रहा है। लेकिन मतदाता, खास तौर से देश के कुल मतदाताओं का पांचवां हिस्सा—चुनाव तक लगभग 16 करोड़ हो जाने वाला युवा मतदाता—अगली केंद्र सरकार की स्थिरता से इसका कितना तालमेल बिठाता है, इससे देश के अगले दस वर्षों की किस्मत तय होगी। अगले चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन उसके अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंचने के अंदेशों के बीच अंधी खैरात और तुष्टीकरण के लोकलुभावन मॉडल के हाशिये पर जाने के भी भरपूर आसार हैं। लोगों को खुदमुख्तार और सक्षम बनाने के बजाय सत्ता-प्रतिष्ठान पर निर्भर बना देने का नेहरू-गांधी परिवार का यह विकास का मॉडल नई पीढ़ी खारिज कर रही है। पांच राज्यों की विधानसभा के चुनावों में इसकी साफ झलक भी दिखी।
नेता और मतदाता के बीच सीधा, गहरा और गर्मजोशी भरा संपर्क सभी पुराने फॉर्मूलों पर भारी है। मार्केटिंग का कोई फॉर्मूला नेता-मतदाता में ऐसा संपर्क कायम नहीं कर सकता, चाहे वह हार्वर्ड के किसी डिग्रीधारी ने रचा हो या आईआईएम के। इसमें नेता की गुणवत्ता सबसे अहम है, जो लोकतंत्र के असली हिस्सेदारों की भागीदारी पक्की करे। आखिर नरेंद्र मोदी भारत भर में प्रधानमंत्री पद के सबसे पसंदीदा उम्मीदवार बनकर यों ही नहीं उभरे और दिल्ली में आम आदमी पार्टी का धूमकेतु ऐसे ही नहीं चमका। विडंबना ही है कि आजमाए फार्मूलों से अभिभूत कांग्रेस यह चेतावनी सुनकर भी आत्मघाती तंद्रा से नहीं जगी।
यह हालत तब है, जबकि अब तक के चुनावी इतिहास में पहली बार लोकसभा चुनाव पार्टियों की कम, और व्यक्तित्वों की पहली बड़ी भिड़ंत है। मजे की बात यह है कि देश का प्रधानमंत्री इस मैदान में नहीं है, और एक राज्य का मुख्यमंत्री है और बाकी दो प्रतिद्वंद्वियों से कहीं आगे है। नेता को केंद्र में रखकर चुनाव में उतरने का भाजपा का यह तीसरा मौका है। तजुर्बे से मिली समझदारी उसके लिए अब तक तो फायदेमंद साबित हुई है। राहुल गांधी इस अखाड़े में पहले भी नहीं थे और अब कांग्रेस को बहुमत मिलने की स्थिति में प्रधानमंत्री पद को लेकर उनका सकारात्मक रुख बेअसर साबित हो रहा है, क्योंकि गाड़ी छूट चुकी है।
अरविंद केजरीवाल के प्रयोग ने देश भर में ध्यान आकृष्ट जरूर किया, पर अपने बेलगाम मंत्री को बचाने के लिए जिस तरह उन्होंने राजधानी को 32 से भी ज्यादा घंटों तक बंधक बनाए रखा, उससे सुशासन देना तो दूर, राजकाज चलाने की उनकी क्षमता भी सवालों के घेरे में है। आंदोलनकारी नेता का यह विघ्नसंतोषी रूप चहेतों का दिल तोड़ने के लिए काफी है। पर भ्रष्टाचार के सवाल पर उबलता शहरी मध्यवर्ग अपने भ्रष्ट और निकम्मे प्रतिनिधियों को धता बताकर केजरीवाल को मोदी की राह का रोड़ा फिर भी बना सकता है। हालांकि सीटों के लिहाज से यह ज्यादा बड़ा होगा, इसमें संदेह है। हां, राहुल गांधी के सियासी सफर को सुरक्षित बनाए रखने की इच्छुक कांग्रेस के लिए यह माकूल विकल्प जरूर है। जाति या क्षेत्र की राजनीति करने वाले उन क्षेत्रीय दलों की आस भी इससे जग सकती है, जिन्हें अन्यथा चुनाव-बाद इस या उस गठजोड़ का दामन थामना पड़ेगा।
अगले चुनाव की एक खास बात है, खामोशी से उभरता भाजपा का नया रूप, जिसकी ओर व्यक्तित्वों के इस घनघोर संघर्ष में कम ही ध्यान दिया गया। अपने मूल और परंपरागत मुद्दों को पार्टी ने जिस सफाई से ‘नेशन फर्स्ट’ की अवधारणा में गूंथ दिया है, वह महज उसके विकास-पुरुष मोदी की अगुवाई की वजह से नहीं है। पार्टी जिस तरह खुद को युवा भारत के अनुकूल ढाल रही है, उसकी जबान बोल रही है, इस नए भारत को सुहाते मसलों पर गौर कर रही है और उनके अमल किए जा सकने वाले हल पेश कर रही है, उससे न केवल उसकी सभाओं में लोग जुट रहे हैं, बल्कि उसे चुनावी दौड़ में आगे भी रखे हुए हैं। पार्टी इतने से ही आत्मतुष्ट न हो जाए और आला नेताओं की स्वाभाविक प्रतिस्पर्धा सीमित रहे, तो कोई कारण नहीं कि पार्टी अपने पिछले सर्वोत्तम प्रदर्शन को पीछे न छोड़े। भाजपा ने 60 पार के मोदी को आगे कर समग्र विकास का नया मुहावरा गढ़ लिया, लेकिन कांग्रेस अगर कमान अपेक्षाकृत युवा राहुल को सौंपकर भी ऐसा नहीं कर पाई, तो उसकी वजह सिर्फ उस पर लदा भ्रष्टाचार के मामलों तथा बेबस मनमोहन सिंह सरकार का बोझ ही नहीं है। यह दोष डीएनए का है, जो किसी फौरी जीन-थेरेपी से ठीक नहीं हो सकता।
असल सवाल यह है कि भ्रष्टाचार, महंगाई और कमजोर नेतृत्व के जिन मुद्दों पर देश कांग्रेस को चलता कर देने को उतारू है, क्या उनके हल के लिए एक स्थिर सरकार अस्तित्व में आएगी? अगले चुनाव में इसका फैसला सत्तारूढ़ पार्टी नहीं, विपक्ष करने जा रहा है।