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इस्तीफे से आगे: क्या मिल सकेगी समग्र परीक्षा तंत्र में सुधार की वास्तविक गारंटी? सुधारों के बीच ये सवाल अहम

अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: ज्योति भास्कर Updated Mon, 27 Jul 2026 08:10 AM IST

सार

नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक प्रकरण से पैदा हुए युवाओं के आक्रोश के बीच शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा राजनीतिक परिस्थितियों की अनिवार्य परिणति माना जा सकता है, लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या यह कदम देश के समग्र परीक्षा तंत्र में सुधार की कोई वास्तविक गारंटी बन सकेगा?
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हाई पावर्ड टास्क फोर्स के सदस्य - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स


दरअसल, पेपर लीक की समस्या किसी एक परीक्षा, एक एजेंसी या एक सरकार तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ दशकों में तकरीबन हर बड़े राज्य में कभी शिक्षक भर्ती, कभी पुलिस भर्ती, कभी राज्य लोक सेवा आयोग और कभी मेडिकल या इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने के मामले सामने आते रहे हैं। अर्थ स्पष्ट है कि संकट उस संस्थागत ढांचे का है, जिसकी सुरक्षा, निगरानी और जवाबदेही लगातार कमजोर हुई है। सरकारें बदलती रहीं हैं, मंत्री बदलते रहे हैं, लेकिन पेपर लीक का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा है।


ऐसे में, किसी एक मंत्री का इस्तीफा राजनीतिक जवाबदेही का प्रतीक तो हो सकता है, लेकिन इससे व्यवस्था बदलेगी ही, यह निश्चित तौर पर कह पाना संभव नहीं है। शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र से पहले ही प्रधानमंत्री मोदी ने पेपर लीक के दोषियों पर कड़ी व समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों और सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम को और कठोर बनाने की बात की थी। ये पहलें स्वागतयोग्य हैं, लेकिन सिर्फ कानून बना देने से समस्या खत्म नहीं होती।


जरूरत इस बात की है कि प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर उसकी छपाई, परिवहन, डिजिटल सुरक्षा और परीक्षा केंद्रों तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया का स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट हो। इसके साथ ही जवाबदेही की संस्कृति भी विकसित करनी होगी। यह तय होना चाहिए कि सुरक्षा प्रोटोकॉल का उल्लंघन कहां हुआ, किस स्तर पर लापरवाही हुई और भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति रोकने के लिए कौन-से सुधार लागू किए गए। जब तक संस्थागत उत्तरदायित्व तय नहीं होगा, तब तक दंड भी निवारक प्रभाव नहीं छोड़ पाएगा।


यह भी उतना ही जरूरी है कि शिक्षा व्यवस्था को राजनीतिक टकराव का स्थायी अखाड़ा न बनाया जाए। विपक्ष का दायित्व है कि वह सरकार से जवाब मांगे और सरकार इसे सुधार के अवसर के रूप में देखे। परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता सरकार या विपक्ष की नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक पूंजी है। इसीलिए, शिक्षा मंत्री का इस्तीफा अंतिम समाधान नहीं हो सकता। अगर आने वाली परीक्षाएं निर्विवाद ढंग से संपन्न होती हैं और युवाओं का भरोसा लौटता है, तभी इस इस्तीफे का कोई अर्थ है और यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सबक भी है।

 

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