उन्होंने दो-राज्य समाधान के लिए भारत के दीर्घकालिक समर्थन का उल्लेख तो नहीं किया, पर यह जरूर कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा समर्थित गाजा शांति पहल में फलस्तीन मुद्दे को संबोधित करने सहित क्षेत्र के सभी लोगों के लिए एक न्यायपूर्ण व स्थायी शांति की प्रतिबद्धता शामिल है। इस दौरान, दोनों देशों के बीच कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, शिक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, और अन्य क्षेत्रों को कवर करने वाले कई समझौते हुए, जो बढ़ती द्विपक्षीय साझेदारी को दर्शाते हैं।
भारत व इस्राइल के बीच यूपीआई सिस्टम को जोड़ने के लिए भी एक समझौता हुआ है, जिससे दोनों देशों के बीच वित्तीय संपर्क मजबूत होगा। शत्रुतापूर्ण पड़ोसियों से घिरे और लगातार आतंकवादी हमलों के शिकार होने के कारण, दोनों देशों के बीच आतंकवाद के मुद्दे पर सहमति स्वाभाविक ही है। इस दौरान, इस्राइली राष्ट्रपति का यह कहना महत्वपूर्ण है कि भारत पश्चिम एशिया के भविष्य का अभिन्न अंग है और यहां की उल्लेखनीय आर्थिक वृद्धि ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
गौरतलब है कि स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार, भारत कई वर्षों से इस्राइल का सबसे बड़ा रक्षा खरीदार रहा है। इसी सुरक्षा सहयोग के कारण द्विपक्षीय व्यापार अक्सर उपेक्षित रह जाता है, जबकि तथ्य यह है कि भारत एशिया में इस्राइल का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। प्रधानमंत्री मोदी का यह आश्वासन कि दोनों देश जल्द ही व्यापार समझौता करेंगे, इस दिशा में एक अहम पड़ाव है। कुल मिलाकर देखें, तो ऐसे वक्त में, जब दोनों ही देश विकास के महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं, तब प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा और अपने इस्राइली समकक्ष के साथ दिखी गर्मजोशी के दोनों देशों और क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक निहितार्थ हो सकते हैं।