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कानून: किरायेदार मकान मालिक नहीं हो सकता, विधान को मजबूती देगा सुप्रीम कोर्ट का फैसला

विनय झैलावत Published by: पवन पांडेय Updated Thu, 26 Feb 2026 07:10 AM IST

सार

सुप्रीम कोर्ट का संपत्ति व किरायेदारी कानून को सुदृढ़ करने वाला निर्णय भारतीय संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जहां किरायेदारी विवाद दशकों तक चलते हैं। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धारा 116 का स्पष्ट प्रयोग किराये से जुड़े सभी हितधारकों को एक स्पष्ट संदेश देता है।
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कानून- किरायेदार मकान मालिक नहीं हो सकता - फोटो : FreePik


यह मामला 1953 में शुरू हुए सत्तर वर्षों से अधिक के किरायेदारी संबंध से जुड़ा हुआ था। इसमें मूल किरायेदार के उत्तराधिकारियों ने मकान मालिक के कानूनी वारिस के स्वामित्व अधिकारों को चुनौती दी थी। मकान मालिक ने वैध रूप से प्रमाणित वसीयत के माध्यम से संपत्ति विरासत में प्राप्त की थी। दो न्यायाधीशों की पीठ ने तीन निचली अदालतों के एकमत निर्णयों को पलटते हुए उन्हें विकृत और मात्र अनुमानों पर आधारित बताया। न्यायालय ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 116 के तहत किरायेदार के विबंधन सिद्धांत का हवाला देते हुए इस बात पर बल दिया कि आधी सदी से अधिक समय तक लगातार किराया भुगतान मकान मालिक के स्वामित्व की स्पष्ट स्वीकृति है। निर्णय में यह भी स्पष्ट किया गया कि बेदखली के मुकदमों में स्वामित्व का प्रमाण, स्वामित्व घोषणा मुकदमों में अपेक्षित कठोर मानकों को पूरा करने की आवश्यकता नहीं है। प्रमाणित वसीयत को कानूनी वैधता प्राप्त होती है। इसे आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता।


न्यायालय ने अपने फैसले में इस सुस्थापित सिद्धांत का हवाला दिया कि किरायेदार द्वारा पूर्व मकान मालिक द्वारा निष्पादित किरायानामा के माध्यम से किराये की संपत्ति पर कब्जा प्राप्त करने के बाद, वह अपने स्वामित्व को चुनौती नहीं दे सकता। यह सिद्धांत कई पूर्व निर्णयों से समर्थित है। इनमें यह माना गया है कि धारा 116 केवल इस मूलभूत सिद्धांत का विस्तार है कि किसी भी व्यक्ति को एक ही समय में स्वीकृति और अभिस्वीकृति, दोनों की अनुमति नहीं है। यह सिद्धांत संपत्ति संबंधी न्यायशास्त्र में कई नीतिगत उद्देश्यों की पूर्ति करता है। पहला, यह किरायेदारों को संपत्ति विवादों में रणनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए अपने कब्जे की स्थिति का दुरुपयोग करने से रोकता है। दूसरा, यह किरायेदारों को वर्षों के लाभकारी कब्जे के बाद स्वामित्व के बारे में अनिश्चितता पैदा करने से रोककर मकान मालिक-किरायेदार संबंधों में स्थिरता को बढ़ावा देता है। तीसरा, यह मकान मालिकों को उन किरायेदारों द्वारा बंधक बनाए जाने से बचाता है, जो स्वामित्व पर सवाल उठाकर मकान  खाली करने से इन्कार कर सकते हैं। चौथा, यह उस संभावित दुरुपयोग को रोकता है, जहां किरायेदार बेदखली से बचने के लिए प्रतिद्वंद्वी स्वामित्व का दावा करने वाले तीसरे पक्ष के साथ मिलीभगत कर सकता है।


ज्योति शर्मा मामले के फैसले का एक सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने निचली तीन अदालतों परीक्षण न्यायालय, प्रथम अपीलीय न्यायालय व द्वितीय अपील में उच्च न्यायालय के एकसमान निर्णयों में हस्तक्षेप करने की तत्परता दिखाई। सामान्य परिस्थितियों में, सर्वोच्च न्यायालय तथ्यों के एकसमान निष्कर्षों को बदलने में काफी संयम बरतता है, क्योंकि वे तथ्यात्मक निष्कर्षों पर पहुंचने की बेहतर स्थिति में होती है।


यह मामला एक ठोस उदाहरण प्रस्तुत करता है कि कैसे सर्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत अपने असाधारण अधिकार का प्रयोग करके गलत निर्णयों से उत्पन्न स्पष्ट अन्याय को दूर कर सकता है। यद्यपि कानून में कब्जा सर्वोपरि है, फिर भी दस्तावेजी स्वामित्व और किराये के भुगतान के माध्यम से निरंतर मान्यता स्वामित्व के दावों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण आधार तैयार करती है। भूस्वामियों को सभी स्वामित्व हस्तांतरणों का उचित दस्तावेजीकरण बनाए रखने की सलाह दी जाती है। किरायेदारों को किरायेदार बनने से पहले मकान मालिक के स्वामित्व की सावधानीपूर्वक पुष्टि कर लेनी चाहिए। बाद में, वे इस पर सवाल नहीं उठा सकते।


इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धारा 116 का स्पष्ट प्रयोग किराये से जुड़े सभी हितधारकों को एक स्पष्ट संदेश देता है। यह सिद्धांत भारतीय संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां किरायेदारी विवाद अक्सर दशकों तक चलते रहते हैं। किरायेदार कभी-कभी स्वामित्व का दावा करने या बेदखली का विरोध करने के आधार के रूप में लंबे समय तक कब्जे का लाभ उठाने की कोशिश करते हैं।

-लेखक पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। edit@amarujala.com
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