कुछ साहित्यकारों ने पुरस्कार क्या लौटाए, भूचाल-सा आ गया। एक ऐसा भूचाल, जिससे अकादमी या सरकार प्रभावित हो, उससे पहले ही कुछ लोग उनके स्वयंभू सिपहसालार बनकर लाठियां भांजने लगे। पुरस्कार लौटाने वालों की लानत-मलामत कर वे उनकी नीयत पर शक कर रहे हैं। और इस ताबड़तोड़ पुरस्कार वापसी के पीछे छिपे कुछ अदृश्य हाथों की खोज करने में जुट गए हैं। किसी राजनेता की पृष्ठभूमि पर कभी कोई सवाल नहीं उठाने वाले, ये करमचंद जासूस टाइप लोग, आज साहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों की पृष्ठभूमि पर सवाल उठा रहे हैं।
कुछ तो चार कदम आगे भी बढ़ गए। ये फिर से नाम कमाने के लिए ऐसा कर रहे हैं। पर अभी ही पुरस्कार क्यों लौटाया? इससे पहले क्यों नहीं लौटाया? इसमें जरूर कोई साजिश है। ये निश्चित ही विकास विरोधी हैं। हद है यार, ये लेखक लोग भी न। पूरे पोलिटिकला गए हैं। ये लोग हर मामूली घटना-दुर्घटना के लिए केंद्र सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं। कुछ उन घटनाओं के लिए भी, जो ऐसे राज्य की कानून-व्यवस्था से जुड़ी हैं, जहां विकास पार्टी की सरकार भी नहीं है।
जरूर इन सबके पीछ कांग्रेस का हाथ है। लगता है, इनमें से कुछ तो पक्के कम्युनिस्ट हैं। एक तो अकादेमी ने इनको सम्मान दिया। इनको एक मामूली साहित्यकार से एक प्रतिष्ठित साहित्यकार बनाया। और अब जब इनको नाम-दाम सब मिल गया, तो उसी पर लात मार रहे हैं।
सबसे मजेदार बात यह कि सरकार के नुमाइंदे, सरकारी कृपा प्राप्त लेखक, कवि, कलाकार जिस भाषा में और जिस तरह से इन सवालों को उठा रहे हैं, उसी भाषा में उन्हीं सवालों को ये कुछ स्वयंभू सिपहसालार भी उठा रहे हैं। सवाल सामाजिक समरसता और शांति पर मंडरा रहे खतरे का है।
कोई माने या न माने, पुरस्कारों की इस वापसी ने कलमकारों और कलाकारों के बीच जबर्दस्त ध्रुवीकरण पैदा कर दिया है। कल कुछ फेंस के इधर होंगे और कुछ फेंस के उधर। बीच में कोई नहीं होगा, क्योंकि बीच तटस्थता जैसी कोई चीज नहीं होती।