इस हफ्ते आंकड़ों पर खासा जोर रहा है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर को लेकर काफी कुछ कहा गया। आखिर जीडीपी विकास दर है कितनी? यह समझने की आवश्यकता है कि जीडीपी का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र से आता है। असंगठित क्षेत्र के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाला हर अर्थशास्त्री जानता है कि इसके आकलन में कितना जोखिम है। जीडीपी में असंगठित क्षेत्र की हिस्सेदारी के आकलन में भारी अंतर हो सकता है, मगर इसे कुल जीडीपी के पचास फीसदी के आसपास होना चाहिए।
यदि कोई नोटबंदी के तुरंत बाद के महीनों में असंगठित क्षेत्र में वृद्धि की गति में आई तेजी या सुस्ती का आकलन कर रहा हो, तो उसे बहुत ही सावधानी बरतने की जरूरत है। यदि आप यह मानते हैं, जैसा कि सीएसओ (केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय) ने दिसंबर माह की गणना की है, कि अकेले इस महीने विकास दर पांच फीसदी से सीधे उछलकर दस फीसदी हो गई, तो आपके इस अनुमान के पीछे ठोस कारण तो होने चाहिए। इसके बिना तो कोई भी जीडीपी की विकास दर में बेतहाशा तेजी दिखा सकता है। जीडीपी की अनुमानित विकास दर के रहस्य के पीछे यह एक कारण हो सकता है।
मेरा मानना है कि ऐसे आकलन बहुत सावधानीपूर्वक किए जाने चाहिए और इसमें काफी समय भी लगेगा। मेरा यह भी मानना है कि बहस का मुद्दा कहीं और है। आखिर नोटबंदी की पूरी कवायद से क्या हासिल हुआ? वस्तु और सेवा में काम आने वाली या फिर दैनिक श्रमिकों पर खर्च की जाने वाली 86 फीसदी मुद्रा एक साथ अमान्य कर दी गई थी। इसके अलावा लाखों लोगों को पुराने रुपये बदलने या धन की निकासी के लिए घंटों तक कतारों में खड़ा रहना पड़ा। क्या इस कवायद का यही उद्देश्य था?
इस पर गौर किया जाना चाहिए कि नोटबंदी की कवायद से काले धन और अघोषित आय पर शायद ही कोई फर्क आया। काला धन तो वैसे भी रियल स्टेट, सोने और विदेशी खातों में ऐसे देशों में जमा है, जहां मुक्त व्यापार और वैश्विक पूंजी बाजार मौजूद हैं। साधारण आय अर्जित करने वाले अधिकांश लोगों के बचत खाते में तो किसी तरह की अघोषित आय होती ही नहीं। वे अपने पास रखे रुपयों को बदलने के लिए बेताब थे, क्योंकि अधिकांश लोगों के पास कुल जमा यही पूंजी तो थी। हैरत नहीं होनी चाहिए कि अधिकांश नकदी वापस आ गई, सिवाय भगवान से डरने वाले काला धन रखने वालों के पास से, जिन्होंने ऐसा लगता है कि अपने पास का बड़ा धन धार्मिक स्थलों को दान दे दिया!
छोटे उत्पादकों, व्यापारियों, किसानों और असंगठित क्षेत्र के भरोसे जीवन-यापन करने वालों को हुए नुकसान का आकलन करने में लंबा समय लगेगा। इसका पूरी तरह से आकलन हो भी पाएगा, इसमें भी संदेह है, क्योंकि असंगठित क्षेत्र की आय का साधारण आकलन तक बेहद कठिन है।
फिर एक कठिन समस्या भी है। महान अर्थशास्त्री रोनाल्ड कोस ने अपनी चर्चित ट्रांजेक्शन थियरी में यह स्थापित किया था कि किसी भी उत्पादक इकाई (फर्म) का, चाहे वह बड़ी हो या छोटी, सबसे महत्वपूर्ण कार्य होता है कि वह अपनी गतिविधियों को इस तरह से व्यवस्थित करे, ताकि ट्रांजेक्शन कॉस्ट (लागत) न्यूनतम हो। यह उत्पादन प्रक्रिया में लगने वाले ज्ञान और इनपुट को एक जगह एकत्र करने में होने वाले खर्च की कुल लागत है। यह लागत उत्पादन के लिए सामान पर लगने वाली लागत से अलग होती है और अक्सर दिखाई नहीं देती। मसलन, हमारे घर के पास कोई चीज अगर पचास रुपये में मिल रही हो और शहर के दूसरे हिस्से में भी उस चीज की उतनी ही कीमत हो, तो अपने घर के पास वह सामान खरीदना सस्ता पड़ेगा, क्योंकि इसमें आने-जाने का खर्च नहीं लगेगा। जब धन का बड़ा हिस्सा अर्थव्यवस्था से हटा लिया गया था, तब उत्पादन से जुड़ी ट्रांजेक्शन कॉस्ट आसमान छूने लगी होगी। इससे उत्पादन पर भारी असर पड़ा होगा। अर्थव्यवस्था पर इसका कितना बुरा असर पड़ा, इसका पता तो धीरे-धीरे ही चल पाएगा।
वित्त मंत्री, रिजर्व बैंक और प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ये तीनों नतीजों को लेकर चुप थे। सारा ध्यान विकास दर पर केंद्रित कर लिया गया, बावजूद इस तथ्य के कि हमारे देश में राष्ट्रीय आय के आकलन में लंबा समय लगता है और जिसके जरिये ही विकास दर का पता चल सकता है। प्रशासन सांकेतिक रूप में यही जतला रहा है कि नोटबंदी का फैसला उचित था, जबकि बृहस्पतिवार को ही कई बैंकों ने ट्रांजेक्शन पर पेनल्टी लगाने की घोषणा की है। ऐसा लगता है कि कुछ अति महत्वपूर्ण लोग कुछ विचित्र किस्म के मौद्रिक विचारकों से प्रभावित हैं।
इस बीच ऐसा लगने लगा है कि जाने-माने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को नालंदा विश्वविद्यालय से बाहर करने के बाद उन्हें जन नीति और कल्याणकारी विमर्श से भी बाहर कर देने की कोशिश हो रही है। जब दो महीने तक करोड़ों लोग कतारों में खड़े थे, तब सामाजिक कल्याण को भी धक्का लगा था। यह अदृश्य तरह का नुकसान है, जिसकी गणना किसी भी राष्ट्रीय खाता आंकड़े में नहीं की जाएगी। इसे एक उपमा के जरिये समझने में मदद मिलेगी। भारत में करोड़ों महिलाएं बिना किसी पारिश्रमिक के घरेलू काम करती हैं और उनका श्रम कभी भी मौद्रिक गणना में शामिल नहीं होता, लेकिन इससे उसका महत्व थोड़ा भी कम नहीं हो जाता। कम से कम अब ऐसे कार्यों पर खर्च होने वाले समय की गणना तो की जाती है। यही इसका महत्व है। घरों को चलाने की यह ट्रांजेक्शन कॉस्ट है। ठीक इसी तरह से तीन महीने तक सारे देश को नुकसान हुआ, जिसकी गणना नहीं की जा सकती। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि साधन ही सब कुछ है, मगर आज उनकी बात सुन कौन रहा है?