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बंगाल में भाषायी क्षेत्रवाद: पंचायत चुनाव से पहले ममता सरकार की बंगाली क्षेत्रीयता की भावना उभारने की कोशिश

बिमल राय
Updated Wed, 14 Jun 2023 06:09 AM IST

सार

पंचायत चुनाव से पहले ममता सरकार बंगाली क्षेत्रीयता की भावना उभारना चाहती है, लेकिन उसके मंसूबे पूरे होते नहीं दिखते।
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ममता बनर्जी (फइल फोटो) - फोटो : ट्विटर/एआईटीसी


फिलहाल पश्चिम बंगाल सरकार की 15 मार्च की एक अधिसूचना को लेकर बवाल मचा है। राज्य सिविल सर्विस (एग्जीक्यूटिव) पदों पर नियुक्ति के लिए प्रथम पत्र में बांग्ला, हिंदी, उर्दू, नेपाली तथा संथाली भाषाओं का विकल्प मौजूद था, पर अधिसूचना के मुताबिक, अब सिर्फ बांग्ला और नेपाली भाषा का ही विकल्प रहेगा। यानी हिंदी, उर्दू और संथाली पढ़ने वाले विद्यार्थी इन परीक्षाओं में भाग नहीं ले सकेंगे। इस पर आसनसोल के भाजपा नेता जितेंद्र तिवारी ने वेस्ट बेंगॉल लिंग्विस्टिक माइनॉरिटी एसोसिएशन का गठन कर इस अधिसूचना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उनका कहना है कि बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब तथा अन्य राज्यों के लोग बंगाल में कई पीढ़ियों से रह रहे हैं और यहां के  विकास में योगदान देते रहे हैं। फिर उन्हें सरकारी प्रशासनिक सेवाओं में नौकरी से वंचित रखने की साजिश क्यों की जा रही है? एसोसिएशन का कहना है कि गैर-बांग्ला स्कूलों में बांग्ला की पढ़ाई की व्यवस्था हो और पांच साल बाद ऐसी अधिसूचना पर अमल हो।  


पहले राज्य के हिंदी स्कूलों में भी ऐच्छिक विषय के रूप में बांग्ला की पढ़ाई होती थी, जिसे अब बंद कर दिया गया है। इससे पहले जून-जुलाई, 2017 में दार्जिलिंग भी भाषायी राजनीति की आग में झुलसा था। कारण था वह सरकारी आदेश, जिसके तहत स्कूलों में 10वीं कक्षा तक बांग्ला की पढ़ाई अनिवार्य कर दी गई थी। ममता सरकार के उस फरमान से पहले से ही छिटपुट तरीके से चल रही पृथक गोरखालैंड की मांग और भड़क गई थी। 1990 के दशक तक राज्य के स्कूलों में बांग्ला पढ़ाई तो जाती थी, लेकिन उसमें फेल हो जाने पर भी बच्चा अगली कक्षा में पहुंच जाता था, क्योंकि बांग्ला अनिवार्य विषय नहीं था।


लेकिन आज अगर कोई अभ्यर्थी बंगाल लोकसेवा आयोग की परीक्षा पास भी कर लेता है, तो उसके लिए विभागीय परीक्षाएं देना अनिवार्य होता है। इनमें गैर-बंगालियों के लिए बांग्ला और बंगालियों के लिए हिंदी भाषा के प्रश्नपत्र शामिल किए जाते हैं। यह परीक्षा पास करने के बाद ही उनकी नौकरी नियमित होती है। अगर कोई उम्मीदवार परीक्षा पास करने में नाकाम रहता है, तो उसकी वेतन वृद्धि के साथ नौकरी का स्थायीकरण रोक लिया जाता है।


वर्ष 2014 में एक छात्रा पश्चिम बंगाल महाविद्यालय सेवा आयोग की परीक्षा पास कर गई। पर आयोग ने उसे नौकरी देने से इनकार कर दिया, क्योंकि वह सिर्फ बांग्ला बोल सकती थी, लिख और पढ़ नहीं सकती थी। इस प्रावधान से बहुत छात्र नौकरी से वंचित हो गए। इससे पहले वाम मोर्चा सरकार के जमाने में हिंदी में प्रश्नपत्र देने की मांग पर पश्चिम बंगाल छात्र संघर्ष समिति का गठन हुआ था। दरअसल वर्षों तक यह मांग इस तर्क से अनसुनी कर दी गई थी कि हिंदी में प्रश्नपत्र देने से गोपनीयता भंग होगी। पर बाद में वाम मोर्चा सरकार ने पहले गणित, फिर विज्ञान और फिर इतिहास के प्रश्नपत्र हिंदी में प्रकाशित करने की सुविधा दी। ममता के सत्ता में आने के बाद भूगोल के प्रश्नपत्र भी हिंदी में प्रकाशित होने लगे।


बंगाल सरकार की नौकरियों में हिंदीभाषियों की भागीदारी वैसे भी नगण्य मानी जाती है और इसका सही आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। हां, न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर समिति की रिपोर्ट से पता चला कि राज्य की सरकारी नौकरियों में 4.7 प्रतिशत मुसलमान हैं।


ममता सरकार की ताजा अधिसूचना के पीछे पंचायत चुनावों को एक कारण माना जा सकता है, ताकि बंगालियों में क्षेत्रवाद की भावना उभारी जा सके, पर लिंग्विस्टिक माइनॉरिटी एसोसिएशन ने बांग्ला पढ़ाने की जो पुरजोर वकालत की है, उससे ममता सरकार के मंसूबे पूरे होते नजर नहीं आ रहे।

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