एशियन गेम्स में हमारे खिलाड़ियों द्वारा जीते मेडल पर अखबारों में विजेताओं के नाम सुर्खियों में छपने लगे, जैसे इस बार देश ने वास्तव में कमाल करके दिखा दिया हो। रेडियो और टीवी पर भी इन पदकों की इतनी चर्चा हुई कि जैसे हम भुलाने की कोशिश कर रहे हों कि चीन के खिलाड़ियों ने हमसे चार गुना ज्यादा मेडल जीते हैं। जब तक हम उन चीजों को लेकर गौरवान्वित होते रहेंगे, जिन पर हमें शर्मिंदा होना चाहिए, तब तक परिवर्तन लाने की संभावना नहीं है। खेलकूद में परिवर्तन लाया जा सकता है, लेकिन तभी, जब हम स्वीकार करेंगे कि हमको शर्मिंदा होना चाहिए कि इतनी बड़ी जनसंख्या के बावजूद भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर के इतने थोड़े खिलाड़ी पैदा करता है।
कारण कई हैं। एक यह कि हमारी सरकारों ने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया है। कोई तीस वर्ष पहले हमने बड़े शान से एशियाड खेल दिल्ली में आयोजित किया था, जिसके लिए आलीशान स्टेडियम बने। लेकिन खेल समाप्त होने के बाद ये खंडहर बनते गए हैं, क्योंकि खेल मंत्रालय ने इनको आम खिलाड़ियों के लिए कभी खोला ही नहीं। यहां सिर्फ विशेष कार्यक्रम होते हैं, जिनमें विदेशी खिलाड़ी भाग लेने आते थे। दूसरा कारण यह है कि हम अपने खिलाड़ियों को वह ट्रेनिंग ही नहीं देते, जो अन्य देश देते हैं। तीसरा कारण यह है कि शुरू से क्रिकेट के अलावा हमने किसी भी खेल को अहमियत नहीं दी है। लेकिन इन सबसे बड़ा एक कारण और भी है, जिसका हम जिक्र तक नहीं करते। वह यह कि हम अक्सर शहरों और महानगरों में कुशल खिलाड़ी ढूंढते हैं और वह भी सिर्फ मध्यवर्ग के बच्चों में।
ग्रामीण क्षेत्रों तक हमारी दृष्टि पहुंचती ही नहीं है। बहुत साल पहले जब हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय खेल मंत्री थे, तब उन्होंने मेरा ध्यान इस ओर दिलाया था, जब मैं यह पूछने उनके पास गई थी कि अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में हम हमेशा इतने पीछे क्यों रहते हैं। उन्होंने मुझे कहा था, इसलिए कि हम खिलाड़ी गलत जगहों पर ढूंढ रहे हैं। जो छोटे बच्चे पुरानी बावलियों में गहरे पानी में डुबकियां लगाकर सिक्के ढूंढकर दो पैसे कमाते हैं, उनको तैरने की ट्रेनिंग दी जाए, तो वे विदेशों में बहुत नाम कमा सकते हैं।
बहुगुणा जी ने और भी उदाहरण दिए। गांवों में तकरीबन हर बच्चे को घुड़सवारी सीखनी पड़ती है, लेकिन किसी एक बच्चे में अगर खास हुनर दिखता है, तो दब जाता है, क्योंकि उसको न ट्रेनिंग दी जाती है और न ही किसी बड़ी स्पर्धा में भाग लेने का अवसर। कोई इत्तफाक नहीं है कि हरियाणा जैसे ग्रामीण राज्य से पहलवान आज लड़कियां भी बनती जा रही हैं। ग्रामीण जीवन अपने देश में इतना कठिन है कि कमजोर बच्चे भी अपने आप ताकतवर बन जाते हैं।
तो सोचिए कि अगर हर ग्राम पंचायत में प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध की जाए, स्टेडियम बनाए जाएं और जिम खोले जाएं, तो क्या हो सकता है। काफी हद तक ये सारे काम राज्य सरकारों के तहत आते हैं, लेकिन देश के लिए खेल नीति तैयार करना केंद्र सरकार का काम न होता, तो दिल्ली में खेल मंत्रालय न होता। परिवर्तन तब आएगा, जब हमारी सरकारों की सोच में परिवर्तन आएगा।
चीन और रूस जैसे देशों में सरकार खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने का पूरा बोझ उठाती हैं। अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में धनवान खेलों में और खिलाड़ियों पर निवेश करते हैं। भारत में हम न इधर के हैं, न उधर के, सो हमारे कुशल बच्चों का हुनर अक्सर बेकार जाता है।