जापान में 30 अप्रैल को सम्राट अकीहितो ने 85 वर्ष की उम्र में पद त्यागा तथा एक मई को उनके 59 वर्षीय राजकुमार नारुहितो ने 126वें सम्राट के नाते पद संभाला। जापान के इतिहास में सम्राट को देवस्वरूप माना जाता है, जो वहां के बहुसंख्यक शिंतो धर्म के भी प्रमुख माने जाते हैं। जापान भारत का घनिष्ठ मित्र माना जाता है, जिसके साथ व्यापार और औद्योगिक सहायता के संबंध शत-प्रतिशत विश्वास के साथ आगे बढ़ रहे हैं। अपने देश में हो रहे लोकसभा चुनाव के शोर के बीच जापान के महत्वपूर्ण घटनाक्रम को दबाना मित्रता का निर्वाह नहीं होगा।
जापान की सम्राट परंपरा ढाई हजार वर्ष से अधिक पुरानी है। 660 ईसा पूर्व वहां सूर्यदेवी एमातेरासू से प्रारंभ वंश परंपरा सम्राट जिम्मू से शुरू मानी जाती है और तब से अखंड अनवरत यह राजवंश चला आ रहा है, जो विश्व का सबसे प्राचीन राजवंश माना जाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध की हृदय विदारक वेदना का चरम जापान ने झेला। इसके बाद सम्राट के अधिकार बहुत सीमित कर दिए गए। अकीहितो ने 1989 में अपने पिता सम्राट हीरोहितो से सम्राट का पद संभाला था। उन्होंने अपने कार्यकाल को शांति और मानवीय आत्मीयता का चेहरा दिया।
जापान की सम्राट परंपरा में पिछले 200 वर्षों में वह पहले सम्राट हैं, जो जीवित अवस्था में सिंहासन का त्याग कर रहे हैं। जबकि जापान के संविधान में जीवन पर्यंत सम्राट का अपने पद पर बने रहने का प्रावधान है। इसलिए जब 2016 में सम्राट अकीहितो ने स्वास्थ्य कारणों से पद त्यागने की घोषणा की तो जापानी संविधान में संशोधन करना पड़ा।
हीरोहितो के समय तक जापान के सम्राट दैवीय गुणों से संपन्न माने जाते थे। पर अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराए जाने के बाद जापान ने पराजय स्वीकार की और सम्राट हीरोहीतो ने दैवीय प्रभा को भी त्यागने की घोषणा की, पर जनता का उनके प्रति सम्मान कभी घटा नहीं। हीरोहितो के समय राजकुमार अकीहितो अपनी पत्नी के साथ 1960 में भारत यात्रा पर आए थे। उसके बाद वह सम्राट की पदवी के साथ 2013 में भारत आए। भारत की यात्रा पर आने वाले वह पहले सम्राट थे। भारत के प्रति उनका गहरा स्नेह जगजाहिर रहा है।
जापान के नए सम्राट नारुहितो ऑक्सफोर्ड में, जबकि उनकी पत्नी यानी जापान की नई साम्राज्ञी मसाको हार्वर्ड से शिक्षित हैं। यह जापान में नए अध्याय का आरंभ है। पहली बार द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जन्मी पीढ़ी ने जापान के सम्राट का पद संभाला है, जो पश्चिमी देशों की परंपरा और भाषा से परिचित है। नारुहितो को एक विशेष समारोह में राजसी पोशाक सहित तलवार और हीरे-जवाहरात और सम्राट की राजमुद्रा प्रदान की गई।
समारोह में जापानी सम्राटों की परंपरागत नियमावली के कारण नारुहितो की पत्नी मसाको शामिल न हो पाईं। जापान में प्रत्येक सम्राट के राज्यारोहण पर एक नई परंपरा का शब्दघोष निर्धारित किया जाता है। नए सम्राट नारूहितो का राज्यकाल रेइवा अर्थात सुंदर समन्वय के नाम से जाना जाएगा। जापान के सम्राट प्राचीन सदाबहार सिंहासन (गुलदाऊदी फूल के नाम पर) पर, जिसे शिंतो परंपरा में बहुत पवित्र माना जाता है, आसीन होकर अपने परंपरागत कर्तव्य का निर्वाह करते हैं। भारत के परम मित्र और सहयोगी देश में यह परिवर्तन जापान के लिए शुभ हो तथा नए सम्राट के नेतृत्व में भारत-जापान मित्रता और घनिष्ठ होगी, यह विश्वास है।