जब मौसम बदलता है, तो उसकी घोषणा करनी नहीं पड़ती। हवा की सुगंध और नई कोंपलें स्वयं इसका एहसास करा देती हैं कि बदलाव आ गया। संसद के बजट सत्र की शुरुआत हो चुकी है। इस बार राष्ट्रपति के अभिभाषण में अपनी सांस्कृतिक और सभ्यतामूलक विरासत को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के उद्धरण से याद किया गया। इससे यह एहसास होना ही था कि एकात्म मानवतावाद के पुरोधा पंडित दीनदयाल उपाध्याय और हिंदू सभ्यता की रक्षा के लिए जीवन देने वाले डॉ मुखर्जी के अनुयायी सत्ता में हैं। जो पार्टियां घृणावश कभी संसद में भी डॉ मुखर्जी के जयंती और श्रद्धांजलि समारोह में शामिल नहीं होती थीं, उन्होंने देखा कि 1953 में कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए डॉ मुखर्जी के बलिदान के बाद पहली बार जम्मू-कश्मीर ने मुखर्जी की विचारधारा मानने वाले शमशेर सिंह मन्हास को राज्यसभा में भेजा है। जहां जम्मू-कश्मीर के बाकी नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसदों ने अंग्रेजी में शपथ ली, वहीं डॉ मुखर्जी की विचारधारा वाले भाजपा सांसद ने डोगरी में शपथ लेकर अपनी जड़ों का गहरापन दिखाया।
कुछ लोग इसे महज प्रतीक बता सकते हैं। मगर यदि प्रतीकों का महत्व न हो, तो फिर हमारे विभिन्न आस्था स्थलों में किसी किस्म के प्रतीक ही नहीं मिलें। ये छोटे प्रतीक बड़े परिवर्तनों के द्योतक होते हैं। जैसा कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी कहा कि निर्धनता उन्मूलन के लिए वित्तीय समावेशन जरूरी है। इस दिशा में मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री जन धन योजना और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण कार्यक्रम शुरू किए, जिसका व्यापक फायदा हुआ है। तय समय से पहले ही देश में 13.2 करोड़ बैंक खाते खुले, जिससे 11 हजार करोड़ रुपये की धनराशि जमा हुई। इसी तरह स्वच्छता को आम चिंता और चर्चा का विषय बनाया गया। नई सरकार का वाकई स्वागत किया जाना चाहिए, जिसने साफ-सफाई से लोगों को इस तरह जोड़ा।
यह निर्विवाद है कि देश की सुरक्षा और नागरिकों के मनोबल को बनाए रखने और बढ़ाते चलने के लिए हमेशा कुछ नई पहल और युगांतरकारी फैसलों की आवश्यकता होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बजट सत्र में ऐसा ही करने का संकेत दिया है। यानी यह बजट भी इस नई पहल की एक ताजगी भरी अनुभूति कराएगा। दोहरे कर, जटिल उद्योग नीति को, जिसके कारण निवेश बढ़ने की बात तो दूर, भारत के निवेशक देश में निवेश करने के बजाय चीन और अन्य देशों में जाने लगे हैं, बदलकर पूंजी निवेश को बढ़ाते हुए देश में निर्माण का लक्ष्य पूरा करने की साधना जरूर फलदायी होगी।
प्रधानमंत्री मोदी के 'विरोधी' हताश होकर पिछले सत्र की ही भांति विरोध के लिए विरोध की आत्मघाती नीति पर चल रहे हैं। उन्हें समझना होगा कि यह देश उनका भी उतना ही है, जितना प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ दल का। बहुत दुर्लभ होंगे ऐसे लोग, जो अच्छे धन को अच्छे मन से जोड़कर जन का भला करने की सोचें। मोदी सरकार की 'सभ्यता का प्रसाद', जो राष्ट्रपति के अभिभाषण में प्रकट हुआ, बदलते मौसम का परिचय ही नहीं देता, बल्कि अगले वर्षों के लिए आशा भी बंधाता है। उम्मीद यही कि हमारा कल आज से निश्चय ही बेहतर और विकसित होगा।
-लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं