हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में होनेवाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए संभावनाएं न के बराबर हैं, लेकिन वह इन तीनों राज्यों की गैर भाजपा दलों से हाथ मिलाना चाहती है, ताकि चुनाव में भाजपा को कड़ी चुनौती दी जा सके। दरअसल लोकसभा चुनाव में खासकर उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा की विफलता ने समूचे विपक्ष का उत्साह खत्म कर दिया है। संसद के भीतर भी न तो तीन तलाक के मुद्दे पर विपक्ष का एकजुट तालमेल देखा गया और न ही हाल में गठित संसदीय समितियों में जगह पाने के लिए उसने कोई उत्साह दिखाया। तृणमूल नेताओं के प्रति सत्तारूढ़ दल का रवैया सही नहीं, लेकिन सरकारी नीतियों का विरोध करती अकेली तृणमूल ही दिखाई पड़ी।
महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में बसपा की कमोबेश उपस्थिति है। लेकिन इन चुनावों में किसी के साथ गठबंधन करने के बजाय वह अकेले ही लड़ेगी। बसपा सुप्रीमो मायावती चुपचाप बैठी हुई नहीं हैं। इसके बजाय वह इन राज्यों के पारंपरिक जनाधार को एकजुट करना चाहती है। यह घटनाक्रम उस कांग्रेस के लिए बुरी खबर है, जिसने हरियाणा में अपनी एक दलित नेता सैलजा को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया है। हरियाणा कांग्रेस में किसी तरह की टूट को टालने के लिए भुपेंद्र सिंह हुड्डा को पार्टी में बनाए रखा गया है। इसके बावजूद कांग्रेस को हरियाणा में बीस या उससे अधिक सीटें पाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ रहा है।