जब मैं यह पढ़ता हूं कि जीत के इरादे से उतरेगी टीम इंडिया तो मेरी उम्मीदें बढ़ जाती हैं। टीम यदि खेल से पहले जीतने का इरादा ही न रखे, तो उसे जीत कैसे मिल सकती है? फिर यह भी कि सामने वाली टीम को भी तो पता होना चाहिए कि आप आखिर उतर किस इरादे से रहे हैं। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि दोनों टीमें जीत के इरादे से उतरें और दोनों ही जीत भी जाएं। हां, क्रिकेट में यह संभव है कि ड्रॉ वाला मामला हो जाए, मगर ऐसा अक्सर तो नहीं होता है न!
खेल शुरू होने से पहले ही यह तय हो जाना चाहिए कि कौन-सी टीम, किस इरादे से उतर रही है। इससे बाद में गफलत नहीं रहती। अब यह तो आप भी जानते ही हैं कि क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है, हम उतरे तो जीत के इरादे से और तीन दिन में ही टेस्ट मैच हार गए, तो इसका दोष हमारी टीम को कम, क्रिकेट के चरित्र को ज्यादा दिया जाना चाहिए।
क्या हम लोग ड्रॉ के इरादे से उतरें, कप्तान पूछता है कोच से। कोच ने कहा, हां, लगता तो ऐसा ही है... क्योंकि भारतीय टीम तो कह चुकी है कि वह जीत के इरादे से उतरेगी। सीनियर खिलाड़ी नाराज होकर बोला, मैंने पहले ही कहा था कि हम पहले से बोल देते हैं कि हमारी टीम जीत के इरादे से उतरेगी, तो उस समय किसी ने मेरी सुनी नहीं। अब भुगतो।
कोच ने कहा, अब यार... तीन टेस्ट तो हरा चुके हैं इस टीम को! हर बार कहना अच्छा थोड़े ही लगता है। इस तरह से तो बाहर की टीमें हमारे साथ खेलना ही छोड़ देंगी।
एक ने कहा, अब यह तो हम कहने से रहे कि हार के इरादे से उतरेंगे, या ड्रॉ का इरादा है हमारा। कहीं सही हो गया, तो लोग कहेंगे फिक्सिंग हो गई।
तो फिर हम क्या कहें, हम किस इरादे से उतरेंगे?
रहने दो, कुछ नहीं बोलते! बाद में बोल देंगे कि हम तो वाइट-वॉश के इरादे से उतरे थे...! सभी ने सहमति जताई और सामने वाली टीम कुछ नहीं बोली। जीतने वाली टीम को इतना त्याग तो करना ही पड़ता है न!