पिछले हफ्ते आईआईटी-रुड़की ने खराब प्रदर्शन की वजह से सत्तर से अधिक छात्रों को निष्कासित कर दिया। संभवतः यह न सिर्फ इस संस्थान के इतिहास में पहला मौका है, बल्कि दूसरे आईआईटी संस्थानों में भी खराब ग्रेड लाने की वजह से इतने सारे छात्रों को निष्कासित किए जाने का शायद यह पहला मामला ही है। मुद्दा यहां छात्रों के निष्कासन का नहीं है, बल्कि उनके शैक्षिक प्रदर्शन का है। बेशक एक स्तर पर 'बेस्ट' होने की वजह से ही वे आईआईटी, आईआईएम, एम्स या अन्य शीर्ष मेडिकल कॉलेजों का हिस्सा बनते हैं, लेकिन वे उन परीक्षाओं के आधार पर 'बेस्ट' बनते हैं, जिनके सवाल अब पूर्वानुमेय (पहले से अनुमान के योग्य) और एक खास फॉर्मेट में आने लगे गए हैं। हालांकि हर कुछ वर्षों के अंतराल पर पाठ्यक्रम बदलता है और जांच के तरीके भी, मगर उन्हें उन रटंतू तरीकों में तुरंत शामिल कर लिया जाता है, जो चहुंओर फैले कोचिंग संस्थान अपने छात्रों को प्रवेश परीक्षाओं में सफल होने के लिए बताते हैं।
हर वर्ष चार लाख से अधिक प्रतिभागी आईआईटी की प्रवेश परीक्षा देते हैं, जिनमें से सिर्फ 15,000 बच्चों का ही चुनाव होता है। कमोबेश यही हाल मेडिकल परीक्षाओं का भी है। जो बच्चे इन परीक्षाओं में सफल नहीं हो पाते, वे अन्य सरकारी और निजी कॉलेजों के व्यावसायिक और सामान्य डिग्री पाठ्यक्रमों में दाखिला लेते हैं। सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेजों (आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थान) से इतर व्यावसायिक पाठ्यक्रम चलाने वाले कॉलेजों में शिक्षा का खर्च लाखों रुपये में आता है। निजी इंजीनियरिंग और निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई का खर्च 30 लाख रुपये से 50 लाख रुपये तक पहुंच गया है। बड़ी संख्या में खुलते इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज छात्रों को व्यावसायिक शिक्षा की तरफ सिर्फ धकेल रहे हैं, भले ही वे इसके लिए अनुपयुक्त क्यों न हों। लेकिन स्कूल और कॉलेज की सामान्य शिक्षा के विपरीत यहां जानकारी की दरकार होती है, न कि रटने या याद करने की। और यही वजह है कि यहां अधिकतर छात्र विफल होने लगते हैं। आईआईटी प्रवेश परीक्षा के टॉपर की कॉलेज में टॉपर होने की बहुत कम संभावना है। यह इसलिए होता है, क्योंकि देश की शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे ढहती सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की तरह दिखने लगी है।
दरअसल, सरकारी सहायता प्राप्त संस्थान और निजी व्यावसायिक कॉलेजों से पास होने वाले अधिकांश छात्रों की गुणवत्ता बेहद खराब होती है। वे नौकरियां तो ढूंढते हैं, पर उसके लिए मानसिक और शारीरिक तौर पर तैयार नहीं होते। कई छात्रों को काम से संबंधित बुनियादी जानकारी तक नहीं होती, दक्षता तो भूल ही जाइए। इस गिरावट की वजह है, निर्देशपरक शिक्षा और पढ़ाई, जिन पर वे इतने निर्भर होते हैं कि उनमें सवाल पूछने अथवा जिज्ञासा जाहिर करने की क्षमता विकसित ही नहीं होती। इसके अतिरिक्त इन संस्थानों से पास होने वाले बेहतरीन छात्रों में से कई उच्च शिक्षा और सिविल सेवा में जाते हैं, जिस कारण रोजगार में उतरने वाले योग्य प्रशिक्षित स्नातकों की कमी हो रही है।
लिहाजा सवाल यह है कि आखिर हम खड़े कहां हैं। असल में, हमारी स्थिति यह है कि हमारे पास औसतन शिक्षित छात्रों की संख्या काफी ज्यादा है, जिनके पास नौकरी के लिए जरूरी योग्यता नहीं हैं। मेरे कहने का अर्थ है कि भारत इंजीनियरों और डॉक्टरों की बड़ी फौज तो पैदा करता है, पर वे सेवा योग्य इंजीनियर और डॉक्टर नहीं होते। तथ्य यह भी है कि हमारे पास विज्ञान, वाणिज्य और कला संकाय के स्नातकों की भी बड़ी संख्या है, जो उन्हीं स्नातकों की जमात पर बोझ बढ़ा रहे हैं, जिनके पास रोजगार पाने के लिए जरूरी योग्यता नहीं है। कहना गलत नहीं होगा कि रोजगार संबंधी विभिन्न घोटाले इन्हीं स्थितियों के परिणाम हैं, जिनमें व्यापम भी शामिल है, जिसकी इन दिनों खूब चर्चा है।
ऐसे में, राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (एनएसडीसी) को एक वरदान मानना चाहिए, जिसकी शुरुआत सरकार ने की है। विभिन्न हितधारकों से समझौता करके एनएसडीसी कौशल विकास की दिशा में मौका देता है, जिससे रोजगार पाने में सहूलियत होगी। इससे अनेक स्नातक छात्र अपने कौशल का विकास कर सकते हैं, जो उन्हें रोजगार पाने में मदद कर सकता है। अब स्थिति यह है कि टीसीएस और इंफोसिस जैसी प्रौद्योगिकी कंपनियां बी श्रेणी के अनेक इंजीनियरिंग कॉलेजों से संपर्क कर वहां अपना समानांतर कौशल विकास पाठ्यक्रम चलवा रही हैं, ताकि वहां से निकलने वाले इंजीनियर उनके ढांचे में फिट हो सकें। अगर तकनीकी शिक्षा को कौशल विकास में शामिल करके इंजीनियरों की मदद की जा सकती है, तो इसी तरह का प्रयास विज्ञान, कला और वाणिज्य संकाय के स्नातकों के लिए भी किया जा सकता है। आखिर विज्ञान के सभी स्नातक अनुसंधान या शिक्षण में तो जाते नहीं, इसी तरह वाणिज्य के सभी स्नातक भला चार्टेड अकाउंटेंट कहां बनते हैं? जाहिर है, यह प्रयास छात्रों और खासकर अभिभावकों के लिए स्नातक डिग्री को अन्य नजरिये से देखने का सबक देगा। यह मात्र योग्यता नहीं होनी चाहिए, बल्कि कुछ ऐसा होना चाहिए, जो रोजगार सुनिश्चित कर सके।
ऐसा करने से लाभ यह होगा कि छात्र को कोई ऐसा हुनर अपनाने का मौका मिलेगा, जो उसके लिए रोजगार के द्वार खोले। यह स्नातक छात्रों की सिर्फ गुणवत्ता बढ़ाने में ही मदद नहीं करेगा, बल्कि उन्हें जानकार और दक्ष भी बनाएगा, जिससे उन्हें दुनिया का सामना करने में मदद मिलेगी। एक अन्य सच्चाई, जो हमें मानकर चलनी चाहिए, वह यह कि हमारे देश में बेरोजगारी हमेशा रहेगी, फिर चाहे बेरोजागर स्नातक हों या न अन्य। रोजगार नीतियां बदल रही हैं, और सरकारी क्षेत्रों को छोड़कर नौकरी कहीं भी स्थायी नहीं है। इसलिए जब तक लोग अपने कौशल का विकास नहीं करेंगे और उसे निखारते नहीं रहेंगे, वे बेरोजगार ही रहेंगे। इस धब्बे को मिटाने के लिए शिक्षा की अवधारणा बदलनी होगी, और ऐसे राज्य की तरफ बढ़ना होगा, जहां शिक्षा मतलब सिर्फ योग्यता नहीं, बल्कि रोजगार प्रदान करने वाला माध्यम भी हो।
-लेखक आउटलुक मनी के संपादक हैं