पाकिस्तान का मुद्दा इन दिनों हमारे यहां छाया हुआ है। यदि हम अतीत में देखें, तो पाएंगे कि आंतरिक विभ्रम और सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं वहां अक्सर हताशाजनक कार्रवाइयों के रूप में सामने आई हैं। इस समय वहां इसी तरह की स्थितियां हैं, इसलिए हमारे इस पड़ोसी मुल्क में कभी भी कुछ हो सकता है।
वहां की गलियों में आतंकी गतिविधियां बढ़ चुकी हैं, सत्ता के कई केंद्रों के कारण वहां अराजकता है, बम धमाके एवं फिदायीन हमले रोजमर्रा की घटनाएं हो गई हैं, अर्थव्यवस्था संकट में है, और इन सबके साथ वहां चुनाव सिर पर हैं। क्या वहां लोकतांत्रिक तरीके से शासन में बदलाव होगा या फिर सेना तख्तापलट करेगी? हमने ट्यूनीशिया, यमन, मिस्र और लीबिया की स्थिति देखी ही है और अब सीरिया में भी देख रहे हैं कि किस तरह सैन्य तानाशाहों और निरंकुश शासकों को या तो हटाया जा रहा है या भगाया जा रहा है और कुछ मामलों में तो उन्हें समाप्त कर दिया गया है। पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति क्या उन सबसे अलग है?
वैश्विक समुदाय पाकिस्तान के साथ बेशक संबंध बनाए हुए है, लेकिन आतंकी संगठनों से उसके आंतरिक संपर्क से वाकिफ भी है। संदिग्ध आतंकियों को ड्रोन हमले के जरिये निशाना बनाया जाता है, लेकिन पाकिस्तान प्रतिरोध जताने के अलावा कुछ नहीं कर सकता। सच तो यह है कि विश्व समुदाय उन विभिन्न आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने में अक्षम है, जो पाकिस्तान की पूरी व्यवस्था में घुसपैठ कर चुके हैं। वस्तुतः पाकिस्तान हर तरफ से दबाव में है और उसकी साख व प्रतिष्ठा का पता इसी से चल पाएगा कि उसके भावी नेताओं के साथ किस तरह का व्यवहार होता है।
प्रधानमंत्री पद के एक दावेदार इमरान खान को उनकी न्यूयॉर्क यात्रा के दौरान कनाडा में पूछताछ के लिए विमान से जिस तरह उतार लिया गया, वह वाकई दुर्भाग्यपूर्ण था। एक सचाई यह भी है कि पाकिस्तान के कई पूर्व राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री ब्रिटेन या सऊदी अरब में निर्वासन में रहते हुए राजनीति कर रहे हैं। जिस देश का माहौल ऐसा भ्रामक है, उसके बारे में कोई भला क्या भविष्यवाणी कर सकता है?
इस समय वहां वर्षों बाद वतन लौटा एक मृदुभाषी आध्यात्मिक गुरु चर्चा में है, जिन्होंने वहां के प्रधानमंत्री को दोषी ठहराने के लिए सेना और सर्वोच्च न्यायालय की प्रशंसा की है। पाकिस्तान ने सुनियोजित तरीके से नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किया है। हमारे दो सैनिकों की हत्या और एक के शव को विकृत किए जाने की बर्बरता के खिलाफ पूरे देश में भारी आक्रोश है। जम्मू-कश्मीर में हम नए सिरे से हिंसा देख रहे हैं, तो झारखंड में माओवादी हमले में पाकिस्तानी हथियार और गोला-बारूद पाए गए हैं। हो सकता है कि पाकिस्तानी आतंकी संगठनों से जुड़े हमारे देश के कट्टरपंथी संगठनों द्वारा और भी हिंसक घटनाएं हों। मैं जब यह लेख लिख रहा हूं, तब असम में पूरी तरह अलर्ट जारी कर दिया गया है।
पाकिस्तानी सेना एवं आईएसआई के कुटिल इरादों को देखते हुए हमें सजग रहना होगा। आंतरिक मामलों से निपटने के लिए हमारे पास गठबंधन सरकार है, पर विदेशी मामलों और खासकर पाक आक्रामकता के खिलाफ पूरा देश एकजुट है। हमने राष्ट्र के रूप में एक स्वर में आवाज बुलंद की है। यह एक ऐसी भावना है, जिसे पाकिस्तान ने कभी समझा नहीं, क्योंकि वह सोच के संकीर्ण दायरे में कैद है। आज के समय में कुछ भी छिपा नहीं है, क्योंकि घटनाओं पर लगभग सबकी नजर रहती है। जहां तक पाकिस्तान की बात है, तो पिछले पांच दशकों में तीन तख्तापलट उसकी असलियत बताने के लिए काफी होने चाहिए।
यह घटनाओं के विश्लेषण के आधार पर कोई फैसला देने का समय नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माकूल जवाब दे दिया है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने विपक्षी नेताओं, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली को हकीकत बता दी है। थलसेना प्रमुख ने अपनी नीति का स्पष्ट तौर पर इजहार किया और अपनी अच्छाई दिखाई। यह देखना वाकई अनूठा है कि पूरा देश अपने बहादुर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि और उनके परिवारों को सांत्वना दे रहा है। इस क्षण घटनाएं फैसलों पर भारी पड़ेंगी, क्योंकि कोई नहीं कह सकता कि पाकिस्तान का रुख क्या होगा। यह पाकिस्तान के साथ क्रिकेट और हॉकी खेलने, नाचने-गाने या बहस करने का समय नहीं है। यह किसी व्यक्ति या व्यवस्था की गलती ढूंढने का भी समय नहीं है। शांति एवं बेहतर संबंधों की दिशा में पहल करना सही था।
हमने अपनी ओर से सहिष्णुता दिखाई, लेकिन एक शैतान मुल्क से निपटने के विकल्प सीमित हैं। जिन्हें शासन में रहने का अनुभव है, वे समझेंगे कि पाकिस्तान के खिलाफ भावी कार्रवाइयों का स्वरूप क्या होगा। हम चुप बैठने नहीं जा रहे, लेकिन हमारा आज का जवाब एक दशक पहले के जवाब जैसा नहीं हो सकता। बदलाव हमेशा चुपचाप होता है और वह हो चुका है। इसका ज्वलंत उदाहरण राजधानी में गैंगरेप की शिकार निर्भया के हक में उठी आवाजों के रूप में देखने में आया। सरकार के कामकाज में दरअसल राष्ट्रीय भावना की ही झलक दिखती है। संकट के क्षणों में होना तो यही चाहिए कि दिल की भावनाओं पर दिमाग का नियंत्रण हो, पर व्यावहारिक रूप में हमेशा ऐसा नहीं होता।