कुछ स्नान भीरु लोग सर्दियों में नहाने से इस कदर खौफ खाने लगते हैं कि बाथरूम उनके लिए दो-तीन महीने तक उत्तरी ध्रुव हो जाता है। शरीर में बैठी आत्मा नहाने की सामाजिक अनिवार्यता के खिलाफ विद्रोह करने पर उतारू होती है, पर शरीर साथ नहीं देता और घबराकर बाथरूम में घुस जाता है।
बंदा बाथरूम में घुस तो गया है, पर नहा नहीं रहा। कोई इनसे पूछे कि बंधु, तुम क्या समझ कर आए थे कि नल से अच्छे दिनों की गर्मागर्म सप्लाई होगी। या तुम बनारस के घाट पर खड़े हो कि इधर डुबकी लगाओ और उधर कोई तुम्हारे कपड़े ले भागे! तुम सोचने में जितना समय ले रहे हो, उतना तो केजरीवाल ने बिना बहुमत की सरकार बनाने के लिए रायशुमारी में भी नहीं लिया था।
बंधुवर, न तुम किसी आतंकी हमले के दोषी हो, जिसको फांसी होने वाली है और न तुम्हारी दया याचिका अभी राष्ट्रपति ने ठुकराई है कि कैंडल ब्रिगेड तुम्हारे समर्थन में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करे। तुम जम्मू-कश्मीर का अस्पष्ट जनादेश भी तो नहीं हो कि कई विकल्प खुल जाएं। क्या तुम इस इंतजार में हो कि टेलीविजन चैनल वाले टीआरपी तलाशते हुए आएंगे और तुम्हें बाथरूम से मुक्त करा एसीयुक्त स्टूडियो में बिठा तुम्हारे साथ हो रहे अत्याचार की मार्मिक कहानी सुनने लगेंगे?
मुमकिन है, तुम अंतिम आशा के तौर पर 'घर वापसी' कराने वालों की ओर देख रहे हो। पर कहीं उन्होंने भी तुम्हारे शुद्धिकरण के लिए खुले में दो-चार बाल्टी उड़ेल दी, और खुदा न खास्ता उसी वक्त कोई तुम्हें दिया गया एकमात्र कंबल भी ले भागा, तो तुम न घर के रहोगे, न घाट के!
मित्र, यह अफसोस करने का वक्त भी नहीं है कि जब हत्यारों तक के मानवाधिकार सुरक्षित हैं, तो स्नान भीरुओं की रक्षा के लिए कोई प्रावधान क्यों नहीं है? तुम जरा उन गरीब लोगों के बारे में सोचो, जो पिछले करीब सड़सठ वर्षों से कपड़े उतारे खुले में ठिठुर रहे हैं। और तुम्हें एक बाल्टी ठंडे पानी से नहाने में कंपकंपी छूट रही है!