यूनुस ने हसीना और भारत के खिलाफ अपना अभियान तेज करते हुए हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में कई नेताओं से मिलकर शिकायत की कि भारत छोटे पड़ोसियों की समुद्री पहुंच बाधित कर रहा है, साथ ही भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र को लेकर भी रोना रोया। इससे पहले उन्होंने अपनी चीन यात्रा के वक्त भी ऐसा ही कुछ किया था। वह दक्षिण-पूर्व एशियाई समूह आसियान की सदस्यता हासिल कर भारत के प्रभाव से बाहर निकलने की जल्दी में हैं। उन्होंने ट्रंप प्रशासन को यह भी बताया कि उन्होंने सार्क को पुनर्जीवित करने के लिए ‘तेज प्रयास’ शुरू कर दिए हैं। संयोग से सार्क की शुरुआत 1970 के दशक में जियाउर रहमान ने की थी, जो ‘शत्रुतापूर्ण’ भारत से अलग होने के इच्छुक थे। यूनुस ने कहा, ‘सार्क का पूरा विचार बांग्लादेश में पैदा हुआ था। हमने सार्क को बढ़ावा देकर उस विचार को दक्षिण एशियाई क्षेत्र में एक से दूसरी राजधानी तक फैलाया। हमारा इतिहास हमें यह मौका देता है, लेकिन किसी तरह से एक देश की राजनीति में यह फिट नहीं बैठता, जिसका हमें भारी खेद है।’
सीमा पार पाकिस्तान से उरी में हुए आतंकी हमले के बाद 2016 में भारत ने सार्क में अपनी भागीदारी रद्द कर दी थी। उस वक्त भूटान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान भी शिखर सम्मेलन से हट गए थे। लेकिन, आज भारत न तो अफगानिस्तान और न ही बांग्लादेश पर भरोसा जता सकता है, जो 1971 में पाकिस्तान की सेना द्वारा किए गए हत्याचार को भुलाकर उसी के साथ दोस्ती की पींगें बढ़ा रहा है।
बांग्लादेश में पाकिस्तान उतनी ही बड़ी हकीकत है, जितना कि वहां पर चीन का बढ़ता प्रभाव। निस्संदेह, अमेरिका इन सबमें सबसे बड़ा है, जिसके सैकड़ों सैनिक बांग्लादेश-म्यांमार सीमा पर एक ‘मानवीय गलियारे’ पर काम करने के लिए तैनात हैं। यूनुस ने अपनी न्यूयॉर्क यात्रा के दौरान यूरोपीय देशों से भी इसके लिए समर्थन मांगा। हालांकि, जनरल जमान इसके विरोध में हैं। चीन का मुकाबला करने के लिए बनाए गए इस गलियारे का भविष्य अनिश्चित है। यह सर्वविदित है कि बांग्लादेश की गतिशीलता अक्सर उसके छात्रों और युवाओं की भूमिका से निर्धारित होती है। हाल ही में हुए तीन विश्वविद्यालयों के चुनावी नतीजे देश के लिए गंभीर संकेत दे रहे हैं। अधिकारियों को इन चुनावों को संपन्न कराने और नतीजे घोषित करने में चार दिन लग गए। यदि विश्वविद्यालय के चुनाव ही चुनौती पेश करते हैं, तो इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यूनुस ने अगले साल राष्ट्रीय चुनाव कराने का जो वादा किया है, उन्हें कैसे करा पाएंगे। बांग्लादेश की सेना कानून-व्यवस्था की निगरानी के लिए खड़ी है, क्योंकि नौकरशाही और पुलिस का एक बड़ा हिस्सा, जिसे नए शासकों ने ‘फासीवादी’ हसीना शासन का समर्थक करार दिया है, नाराज है और चुपचाप असहयोग कर रहा है।
विश्वविद्यालयों के चुनावों में इस्लामी कट्टरपंथियों की जीत भारत की चिंता बढ़ाती है, जिनमें सबसे बड़ी हार पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की हुई है। हसीना की बेदखली और अवामी लीग पर प्रतिबंध के बाद बीएनपी को स्पष्ट विजेता माना जा रहा था, लेकिन जमीनी हालात बदल गए, क्योंकि सत्ता में वापसी के प्रति आश्वस्त बीएनपी कार्यकर्ता सड़कों पर उपद्रवी होने की वजह से अलोकप्रिय हो गए हैं। जमात का बढ़ना काफी कुछ कहता है, लेकिन इसकी टक्कर यूनुस के आशीर्वाद से बनी ‘किंग्स पार्टी’ नेशनल सिटीजंस पार्टी (एनसीपी) से भी है। हालांकि, एनसीपी अब तक न तो अपने कैडर बना पाई है और न ही अन्य बेहतर संगठित समूहों के खिलाफ जमीनी स्तर पर अपनी पकड़। एनसीपी ने यूनुस पर देश का संविधान बदलकर ‘जुलाई चार्टर’ को लागू करने का दबाव बनाया, हालांकि वह सेना प्रमुख जमान की वजह से इसमें सफल नहीं हो सके।
यूनुस हसीना की वापसी को लेकर भी डरे हुए हैं। अवामी लीग बांग्लादेश की सबसे बड़ी पार्टी है, जिसकी जड़ें काफी गहरी हैं और उसके पास बड़ा कैडर है, भले ही उसके कई नेता या तो जेल में हैं, या भाग रहे हैं या फिर निर्वासित हैं। विडंबना यह है कि अवामी लीग को बीएनपी का समर्थन मिला है। जब हसीना को सत्ता से बेदखल किया गया, तो उनकी प्रतिद्वंद्वी जिया की प्रतिक्रिया शत्रुतापूर्ण नहीं थी। संभवतः जिया ने इस्लामवादियों के एकजुट होने का पूर्वानुमान लगा लिया था। अब, बीएनपी महासचिव मिर्जा फखरुल आलमगीर ने मांग की है कि हसीना और अवामी लीग पर कथित अपराध के लिए मुकदमा चलाया जाए और दोषी पाए जाने पर सजा दी जाए। लेकिन, उन्हें चुनाव से बाहर रखने का मतलब होगा, उन्हीं गलतियों को दोहराना, जो हसीना ने की थीं। नाराज इस्लामवादियों ने उन्हें हसीना का ‘एजेंट’ कहा है।
दरअसल, जमात और एनसीपी, दोनों ही अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए समय चाहती हैं, जबकि बीएनपी तय समय पर चुनाव। फिलहाल, बीएनपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती है, लेकिन बहुमत में आने की उम्मीद कम ही है। फिर उसे इस्लामवादियों के साथ गठबंधन करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। शायद, मौजूदा वैश्विक रुझान को देखते हुए यूनुस और पश्चिमी आकाओं को एक दक्षिणपंथी और अति-दक्षिणपंथी गठबंधन ही चाहिए। लेकिन इस्लामवादियों के साथ ऐसा नहीं है, जो मुक्ति संग्राम के विरोधी थे। वे बीएनपी के साथ कोई रिश्ता नहीं रखना चाहते, जो दक्षिणपंथी होने के बावजूद भारत की आलोचना करती है, लेकिन ‘मुक्ति’ के सिद्धांतों को बढ़ावा देती है। इस्लामवादी संविधान में बदलाव करके आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था करने के लिए अभियान चला रहे हैं, जिससे उन्हें संसदीय वैधता हासिल करने और सत्ता का केंद्र बनने का मौका मिलेगा। ऐसे हालात में, बांग्लादेश में चुनाव चाहे फरवरी में हों या बाद में, उसकी पहचान की खोज फाइनल नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा सेमीफाइनल ही हो सकते हैं।