नए साल की शुरुआत एक निराशाजनक खबर के साथ हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो ने किसानों की आत्महत्या से संबंधित अपनी ताजा रिपोर्ट जारी की है, जिसके मुताबिक, किसानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ी है और वर्ष 2015 में 12,602 किसानों ने आत्महत्या की। औसतन हर 41 मिनट में हमारे देश में कहीं न कहीं एक किसान आत्महत्या करता है। वर्ष 1995 से 2015 के बीच के 21 वर्षों में देश के कुल 3,18,528 किसानों ने आत्महत्या की है।
यह और कुछ नहीं, कृषि क्षेत्र में निरंतर मौत का तांडव है। आप चाहे इसे जो भी नाम दें, लेकिन किसान आत्महत्या की यह अंतहीन गाथा दोषपूर्ण आर्थिक नीतियों का नतीजा है, जिन्हें इसी दौरान लागू किया गया और किसानों को जान-बूझकर गरीब रखा गया। कृषि को व्यवस्थित तौर पर आर्थिक रूप से अलाभप्रद बनाया गया, जिसके कारण किसान कर्ज के दुश्चक्र में फंस गए। यहां तक कि देश के खाद्यान्न का कटोरा कहे जाने वाले पंजाब में कृषि आय स्थिर बनी हुई है। पिछले एक दशक में कृषि ऋणग्रस्तता में 22 गुना की बढ़ोतरी हुई है।
पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने एक बार ठीक ही कहा था कि किसान कर्ज में जन्म लेता और कर्ज में ही मर जाता है। इस भयावह संकट में और बढ़ोतरी ही हुई है। एनसीआरबी के नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि कर्ज का बढ़ता पहाड़ और कृषि संबंधी अन्य समस्याएं किसानों की आत्महत्या की प्रमुख वजह हो सकती हैं। दो अन्य कारणों-गरीबी और बीमारी को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। दोनों घटती आय से सीधे जुड़े हैं। कुछ अध्ययन बताते हैं कि इलाज के बढ़ते खर्च के कारण भी बड़ी संख्या में किसान गरीबी के चंगुल में फंस जाते हैं।
किसान कर्ज के नीचे किस कदर दबे हैं, यह चंडीगढ़ स्थित ग्रामीण एवं औद्योगिक विकास अनुसंधान केंद्र की ओर से किए गए अध्ययन से स्पष्ट होता है। इस अध्ययन के मुताबिक, पंजाब के 96 फीसदी ग्रामीण परिवारों की आय खर्च की तुलना में कम है। 98 फीसदी ग्रामीण परिवार कर्ज में दबे हैं। किसान आत्महत्या के सर्वाधिक मामले महाराष्ट्र में दर्ज किए गए, जहां 2015 में 4,291 किसानों ने आत्महत्या की, जबकि 2014 में 4,004 किसानों ने आत्महत्या की थी। लगातार दो वर्षों-2014 एवं 2015 के दौरान देश में हुई कुल किसान आत्महत्या का एक तिहाई महाराष्ट्र में दर्ज किया गया। इसके अलावा कर्नाटक, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में बड़ी संख्या में किसानों ने आत्महत्या की। करीब 87 फीसदी किसान आत्महत्या इन सात राज्यों में हुई।
बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, नगालैंड, मिजोरम और गोवा में किसान आत्महत्या का कोई मामला दर्ज नहीं किया गया। लेकिन बिहार में सात, तमिलनाडु में 604, झारखंड में 21 और मध्य प्रदेश में 709 खेत मजदूरों की आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए। यदि हम किसानों और खेत मजदूरों की आत्महत्या के सभी मामले को एक साथ जोड़ दें, तो वर्ष 2015 में कृषि क्षेत्र में 12,602 लोगों ने आत्महत्या की, जो 2014 के मुकाबले दो फीसदी ज्यादा है, क्योंकि तब यह आंकड़ा 12,360 का था। पिछले वर्ष किसानों और खेत मजदूरों की आत्महत्या के आंकड़े को अलग-अलग दर्ज करके भ्रम पैदा किया गया, क्योंकि सरकार किसान आत्महत्या के आंकड़े को कम दिखाना चाहती थी।
वर्ष 2014 में किसानों और खेत मजदूरों, दोनों को मिलाकर 12,360 लोगों ने आत्महत्या की, जो वर्ष 2013 के आंकड़ों से पांच फीसदी ज्यादा थी। दूसरे शब्दों में कहें, तो इस त्रासदी को कम दिखाने के साहसिक प्रयासों के बावजूद किसान आत्महत्या में बढ़ोतरी ही हुई है। किसान आत्महत्या के आंकड़े को कम दिखाने और कृषि क्षेत्र की गुलाबी तस्वीर पेश करने की तमाम कोशिशों के बावजूद मौजूदा समय में जारी भयानक कृषि संकट स्पष्ट रूप से दिखता है।
कृषि क्षेत्र के संकट और आत्महत्या के बीच के संबंध को जानने के लिए मैंने आत्महत्या की कोशिश करने वाले कई किसानों से बातचीत की, कि उन्होंने आत्महत्या की कोशिश क्यों की। बेशक इस बारे में मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री बेहतर काम कर सकते हैं, लेकिन मुझे जो पता चला, वह यह कि जो अपनी जान देने का अतिवादी कदम उठाते हैं, वे वास्तव में मजबूत राजनीतिक संदेश देना चाहते हैं। उन्होंने विरोध प्रदर्शन या हिंसा का सहारा नहीं लिया, बल्कि इसके बजाय उन्होंने उदासीन प्रशासन को कृषि क्षेत्र में जारी भयानक संकट की तरफ ध्यान दिलाने और युद्ध स्तर पर इसे दूर करने के लिए अपनी जान दे दी। लेकिन दुर्भाग्य से राजनीतिक नेताओं और नीति निर्माताओं ने इस खूनी संकट पर सफाई देना ही पसंद किया और ऐसी नीतियां बनाईं, जिसका उद्देश्य किसानों के लिए ऐसी आर्थिक मुश्किलें पैदा करना था कि किसान खेती छोड़ दें, ताकि इन्फ्रास्ट्रक्चर, निर्माण और रियल एस्टेट प्रोजेक्ट को सस्ते श्रमिक मिल सकें।
यह स्पष्ट रूप से दिखता है कि राष्ट्रीय कौशल विकास परिषद द्वारा इस तरह की योजना बनाई जा रही है, जिसका उद्देश्य अगले पांच वर्षों में कृषि क्षेत्र से मौजूदा 57 फीसदी श्रमबल को घटाकर 38 फीसदी करना है। इस प्रक्रिया को उलटना होगा। लोगों को कृषि क्षेत्र से विस्थापित कर शहरी क्षेत्रों में पलायन के लिए मजबूर करना आगे का रास्ता नहीं है। खेती को आर्थिक रूप से व्यावहारिक और टिकाऊ बनाने में ही चुनौती निहित है। लेकिन 1995 के बाद आने वाली सभी सरकारें संकटग्रस्त कृषि क्षेत्र को मुश्किलों में राहत देने में विफल रही हैं। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया है कि उनकी सरकार गरीबों और किसानों के लिए समर्पित है। ऐसे में यह देखना होगा कि क्या वह कृषि क्षेत्र को पुनर्जीवित करने और किसानों के चेहरे पर मुस्कराहट लाने में सक्षम होंगे। यह उम्मीद करें कि वर्ष 2017 किसानों के सपने पूरे होने का वर्ष हो।