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कृषि: प्लास्टिक का विकल्प बनते बांस के उत्पाद, आमदनी का अच्छा साधन है 'हरा सोना'

रमेश ठाकुर
Updated Thu, 13 Jul 2023 08:00 AM IST

सार

भारतीय परिवेश में बांस को ‘हरा सोना’ कहा गया है, क्योंकि दूसरी फसलों के मुकाबले बांस में आमदनी अच्छी है।
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फाइल फोटो। - फोटो : अमर उजाला।


बांस से निर्मित वस्तुओं की ओर लोगों का आकर्षण फिर बढ़ रहा है। दरअसल, दुनिया प्लास्टिक वस्तुओं से तौबा करने लगी है, जिसका विकल्प बांस बन रहा है। इसलिए इसका बाजार अचानक बढ़ा है। लोग प्लास्टिक की जगह बांस के इको-फ्रेंडली उत्पादों को अपनाने लगे हैं। चीन बांस उत्पादन में कई दशकों से अव्वल है, जहां रोजमर्रा के सामान, जैसे-रसोई के बर्तन, फर्नीचर, खिलौने, पेंटिंग, सजावटी सामान और हस्तशिल्प का प्रयोग बहुत ज्यादा होने लगा है। उसी को देखकर हिंदुस्तान में फर्नीचर व इको-फ्रेंडली उत्पादक कंपनियां अब किसानों को बांस की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की राय देने लगी हैं। निश्चित रूप से इस कदम से पर्यावरण की बेहतरी, किसानों का अच्छा मुनाफा व ग्रामीण स्वरोजगार के तौर पर ‘बांस की खेती’ का अच्छा भविष्य दिखने लगा है।


संसार में बांस की कुल 1,662 प्रजातियां हैं, जिनमें से 130 उच्च कोटि की प्रजातियां भारत में हैं। मणिपुर और मिजोरम में सबसे अच्छा बांस उगता है। इसके अलावा देश के कुछ मैदानी क्षेत्रों में भी कभी अव्वल दर्जे का बांस उपलब्ध होता था। दूर न जाएं, उत्तर प्रदेश का बरेली जनपद, जिसे ‘बांस बरेली’ के नाम से जानते हैं, वहां बांस की खेती कभी बड़े स्तर पर होती थी। लेकिन आज वहां बांस का उत्पादन घट गया है। ऐसे और भी बहुतेरे क्षेत्र हैं, जहां बांस की खेती हुआ करती थी। बरेली से सटा जिला है पीलीभीत, वहां की बांसुरी विश्व प्रसिद्ध रही है।


हाल ही में बांस उपयोगिता और आधुनिक युग में इसकी जरूरत को लेकर दर्जनों यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने न्यूयॉर्क में एक साथ शोध किया, जिसमें हंगेरियन यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर से संबंध रखने वाले वैज्ञानिक एंजॉय नाथन ने कहा कि बांस के जरिये बायोएथेनॉल, बायोगैस और अन्य बायोएनर्जी उत्पाद भी बन सकते हैं। उनका जोर था कि विश्व के वे देश बांस के उत्पादन को बढ़ाने में फिर विचार करें, जहां-जहां बांस का उत्पादन संभव है। उनका इशारा भारत की ओर ही था।


बहरहाल, हिंदुस्तान बांस की अहमियत को अच्छे से समझता है। आजादी के शुरुआती वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था में यह क्षेत्र बड़ी भूमिका निभाता रहा। पर, आधुनिक चकाचौंध ने बांस की खेती-बाड़ी और इससे निर्मित वस्तुओं से जनमानस का मोहभंग कर दिया। हालांकि पूर्वोत्तर राज्य आज भी बांस-बेंत के हस्तशिल्प निर्मित उत्पादों पर निर्भर हैं, क्योंकि बांस के जरिये ही वे अपनी अलहदा विशेषज्ञता के लिए लोकप्रिय रहे हैं। वैसे, बांस की खेती के लिए मध्य प्रदेश, असम, कर्नाटक, नगालैंड, त्रिपुरा, ओडिशा, गुजरात, उत्तराखंड व महाराष्ट्र राज्यों की मिट्टी और वहां का जलवायु मौसम आज भी अनुकूल हैं।


भारतीय परिवेश में बांस को ‘हरा सोना’ कहा गया है, क्योंकि दूसरी फसलों के मुकाबले बांस में आमदनी अच्छी है। कृषि मंत्रालय चाहता है कि किसान फिर से बांस की खेती करें। इसके लिए सब्सिडी और बीमा योजना भी बनाई गई है। बांस की खेती से 25-30 टन प्रति हेक्टेयर बांस उगता है, जो तीन से चार हजार रुपये प्रति टन तक बिकता है। किसान चाहें, तो बांस की रोपाई के तीन साल बाद प्रत्येक वर्ष सात से आठ लाख रुपये प्रति हेक्टेयर कमा सकते हैं। भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय बांस मिशन’ भी शुरू किया है, जिसके तहत किसानों को बांस के पौधों पर सब्सिडी देना भी आरंभ किया गया है, बावजूद इसके किसान बांस के उत्पादन में रुचि नहीं ले रहे हैं।

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