भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच 23 और 24 अगस्त को होने वाली बातचीत पर शक और अविश्वास के कितने ही बादल क्यों न मंडराते दिखें, लेकिन इसका अपना महत्व है, जो भारत के पक्ष में है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में हाल ही में हुए आतंकवादी हमलों और लगातार हो रही गोलाबारी तथा बढ़ती घुसपैठ के कारण सामान्य वातावरण यही बना है कि जब तक पाकिस्तान अपने व्यवहार में सुधार नहीं दिखाता, तब तक उससे वार्ता का कोई अर्थ नहीं है।
मगर रूसी शहर उफा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ के बीच बनी सहमति के बाद इस प्रस्तावित वार्ता को समाप्त करने का अर्थ तो पाकिस्तानी सेना और आतंकवादी वर्ग को सफल बनाने जैसा ही होगा। उफा में जारी संयुक्त वक्तव्य में कश्मीर का जिक्र तक न होने से पाकिस्तान के असली सूत्रधार-सेना और आईएसआई इतना बौखला गई कि अगले ही दिन सरताज अजीज को 'कश्मीर के बिना भारत से कोई चर्चा नहीं' जैसा बयान देना पड़ा। वही सरताज अजीज अब जब दिल्ली आ रहे हैं, तो मोदी सरकार ने किसी भी भारतीय बिंदु पर झुके बिना उनको ठीक से 'दावत' देने का मन बना लिया है।
पाकिस्तान में एक पूरी लॉबी, जो ताकतवर भी है, प्रयास करती रही है कि भारत से कोई चर्चा न हो और गोलाबारी और आतंकवाद बढ़ता रहे। आईएसआई पंजाब में फिर से आतंकवाद फैलाने के लिए सक्रिय दिख रही है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में नकली करेंसी और नशीले पदार्थों की तस्करी के साथ ही वह आतंकी गुटों को हथियारों के जरिये भी मदद पहुंचा रही है। हाल ही में आईएसआई के कुख्यात प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल हामिद गुल की मौत हो गई, जिसने जनरल जिया उल हक के समय भारत को लहूलुहान करने की आतंकी नीति बनाकर पंजाब में दहशतगर्दी फैलाई थी।
पंजाब में फिर इस काले अध्याय को रचे जाने की साजिश आईएसआई की करतूतों का हिस्सा है। हाल ही में पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकी नावेद से पूछताछ में कश्मीर घाटी में आतंकवाद को बढ़ाने के साथ ही देश के अन्य क्षेत्रों में आईएस (इस्लामिक स्टेट ) के विस्तार तक के संकेत मिले हैं। पाकिस्तानी सरकार ने भी भारत के साथ मित्रता का कोई संकेत देने के बजाय जिस दिन सरताज अजीज दिल्ली में होंगे, उसी दिन कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को आमंत्रित कर अपनी हठधर्मिता का परिचय दिया है। सरकार ने पाकिस्तान परस्त अलगाववादियों को नजरबंद कर सही किया।
मीरवायज ने हाल ही में बयान दिया कि 'दोनों देशों को युद्धविराम का उल्लंघन नहीं करना चाहिए और कश्मीरी प्रतिनिधियों से बातचीत करनी चाहिए।' यह भारत ही है, जहां अलगाववादियों को ऐसे बयान की छूट मिलती है, जिसमें वे पीड़ित भारत को आतंकवादी पाकिस्तान के बराबर रखते हैं। पिछले वर्ष अगस्त में भी यही हरकत की गई थी, तब भारत ने विदेश सचिव स्तर की वार्ता रद्द कर दी थी। पाकिस्तान की ओर से हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं कि प्रस्तावित वार्ता रद्द हो जाए।
आतंकी हमले के बाद सीमा पर लगातार युद्धविराम उल्लंघन की 11 घटनाएं हो चुकी हैं, जबकि इसी वर्ष सिर्फ जून तक पाकिस्तान ने 199 बार युद्धविराम का उल्लंघन किया। इसके बावजूद भारत ने जब वार्ता रद्द नहीं की, तो कश्मीर के हुर्रियत अलगाववादियों को आमंत्रण भेजा गया। भड़काने वाली इन कार्रवाइयों के बावजूद दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की प्रस्तावित वार्ता को रद्द न करना हमारे उस बढ़े आत्मविश्वास को दर्शाता है, जिसे नरेंद्र मोदी ने विश्व में अपनी शक्तिशाली छवि स्थापित करते हुए मजबूत किया है। हाल में संपन्न नगा शांति समझौते ने भी न केवल सरकार की दूरदर्शिता को प्रदर्शित किया है, बल्कि इससे भारत का सैन्य आत्मविश्वास भी बढ़ा है।
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल अपने पाकिस्तानी समकक्ष को भारत में आतंकवाद फैलाने की पाकिस्तानी कोशिशों और उसके द्वारा संरक्षित आतंकियों का सप्रमाण ब्योरा देने वाले हैं। पाकिस्तान भी अपनी ओर से ऐसा ही कुछ ब्योरा देगा। देखना यह है कि वार्ता के बाद जब औपचारिक 'फोटोअप' होगा, तो सरताज कैसा चेहरा लेकर जाते दिखेंगे। यह विडंबना ही है कि इस परिस्थिति में कांग्रेस, जो हमेशा पाकिस्तान से वार्ता की पक्षधर रही है, सरकार के इस कदम का विरोध कर रही है।
भू-राजनीतिक परिदृश्य केवल भारत में पाकिस्तानी आतंकवाद के फैलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि अफगानिस्तान में तालिबान और उन्हें पाकिस्तानी सेना से मिलता समर्थन तथा आश्चर्यजनक घटनाक्रम में आईएस का अफगान तालिबान पर हमला बोलना, भारत के लिए धीमी गति से बढ़ता खतरनाक संकेत है। पारंपरिक और खुले युद्ध का सामना करना सरल होता है, लेकिन आईएस की तर्ज पर सांप्रदायिक जुनून पैदा कर अचानक छोट-छोटे हजार हमलों की तैयारी का जवाब बेहद जटिल कार्य है।
भारत की चुनौती यहीं सीमित नहीं है। चीन पूरी तरह से पाकिस्तान को अपना अड्डा बनाता जा रहा है। गिलगित से लेकर ग्वादर तक चीन की उपस्थिति और शिंजियांग को आर्थिक रेशम मार्ग से ग्वादर तक जोड़ने का चीनी अभियान भारत की सुरक्षा के लिए चुनौती है। इस्लामाबाद के सैन्य विश्लेषक रूस, चीन और पाकिस्तान के त्रिध्रुवीय सहयोग की भी चर्चा कर रहे हैं, क्योंकि न केवल रूस चीन को सैन्य सामग्री एवं युद्धक पनडुब्बियां देने वाला सबसे बड़ा देश बन गया है, बल्कि पाकिस्तान के साथ भी उसके सैन्य संबंध मजबूत हो रहे हैं, जो भारत के लिए स्तब्धकारी है।
आज आवश्यकता पाकिस्तान के आतंकवाद और सीमा पर युद्धविराम उल्लंघन की घटनाओं का तीव्र जवाब देने की है। भारत के लिए यह सकारात्मक संकेत है कि मुस्लिम देशों में पाकिस्तान के प्रति अब अंध समर्थन का भाव नहीं है। प्रधानमंत्री की हाल की अबूधाबी यात्रा इसका प्रमाण है। दरअसल जरूरत पाकिस्तान को हरसंभव मंच से बेनकाब करने की है। लगता है, सरकार इसी रणनीति पर काम कर रही है।