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ठंड में घर वापसी

Mon, 05 Jan 2015 08:01 PM IST
सुधीर विद्यार्थी
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साधो, उन्होंने कबीर से कहा, घर लौट आओ, बहुत ठंड पड़ रही है। घर में दान में मिला हुआ धर्म का कंबल है, रूढ़ियों की पुरानी रजाई है और सांप्रदायिकता का अलाव सुलग रहा है। यहां आ जाओगे, तो सुखी रहोगे। यह सुनकर कबीर को गर्मी महसूस हुई। पर उसने देखा कि घर में उसके लिए ओसारे की जगह निर्धारित कर दी गई। उसे भीतर के कोठे में घुसने की मनाही थी। पूछने पर एक बोला, अभी तुम विधर्मी हो। घर वापसी के लिए तुम्हारा शुद्धीकरण जरूरी है। कबीर को इसमें विश्वास नहीं था। उसे बताया गया कि तुम्हारे पूर्वज इसी घर में रहते थे। तुम्हारी रगों में उनका खून दौड़ रहा है। यहां तुम्हें अपनापन मिलेगा। अपने धर्म में ही मरने में सुख है।
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कबीर ने कहा, पर मैं तो जीना चाहता हूं। मुझे शुद्धीकरण में भरोसा नहीं। करना है, तो पहले इस घर को शुद्ध करो। यहां ऊंच-नीच की बू आती है। इसमें रहने वाले एक साथ रोटी नहीं खा सकते। इनके हाथ दुर्भावनाओं के खून से सने हैं। कबीर की बातें सुनकर वे अचकचा गए। वह लौटकर चलने लगा, तो रास्ते में उसे चंगाई सभा के लोग मिले। वे बोले, तुम बीमार हो कबीर। हम तुम्हें अच्छा कर देंगे। तुम्हें सिर्फ चोला बदलना है। और यह लो पवित्र किताब। इसे पढ़ो। हमारे रास्ते पर चलकर ही तुम्हारा कल्याण होगा।

यह आवाज कान में पड़ते ही कबीर चक्कर में पड़ गया। उसने लंबे डग भरे। माथे पर छलछला आए पसीने को पोछकर पगडंडी पर चल ही रहा था कि कुछ टोपीधारी उसे घेरकर खड़े हो गए। वे एक साथ बोले, हमारा रास्ता सही है। हमारे यहां सब एक दस्तरख्वान पर खाना खाते हैं, एक साथ बैठकर मालिक को याद करते हैं। हमारे घर छुआछूत और गैरबराबरी नहीं। इस घर में तुम्हें इज्जत मिलेगी।
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इन सबका शोर सुनकर कबीर का जी भन्ना गया। वह चीखकर बोला, मैं किसी घर में रहना और लौटना नहीं चाहता। मैं तो ऐसी जगह रहना चाहता हूं, जहां लोग सिर्फ मनुष्य होकर जी सकें। कबीर इतना ही कह पाया था कि तीनों घरों के लोग मिलकर उसे बेतहाशा पीटने लगे।
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